नितिन नबीन नहीं बनेंगे राज्यसभा सदस्य? राह रोकेगा अमित शाह–गडकरी वाला ‘फॉर्मूला’

पटना। बिहार की राजनीति इन दिनों राज्यसभा की खाली होने वाली पांच सीटों को लेकर खासा गर्माई हुई है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार दो सीटों पर किन चेहरों को भेजेगी। जब नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, तभी से यह कयास तेज हो गए थे कि राज्यसभा की एक सीट लगभग उनके नाम तय है।

हालांकि, पार्टी सूत्रों की मानें तो तस्वीर उतनी सीधी नहीं है। संभावना यह भी जताई जा रही है कि नितिन नबीन राज्यसभा न जाएं। इसके पीछे भाजपा की एक पुरानी ‘परंपरा’ या यूं कहें एक ‘फॉर्मूला’ बताया जा रहा है—जिसका उदाहरण नितिन गडकरी और अमित शाह जैसे बड़े नेताओं के कार्यकाल में भी देखने को मिला था।

विधायक रहते भी राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बड़े नेता

भाजपा में यह कोई अनोखी बात नहीं है कि कोई नेता विधायक रहते हुए भी लंबे समय तक राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालता रहा हो।

नितिन गडकरी इसका बड़ा उदाहरण हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से राजनीति की शुरुआत करने वाले गडकरी 1 जनवरी 2010 से 22 जनवरी 2013 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। उस समय वे महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य थे। यानी वे विधायक/परिषद सदस्य रहते हुए ही पार्टी के सर्वोच्च संगठनात्मक पद पर बने रहे। बाद में 2014 में वे नागपुर से लोकसभा सांसद चुने गए।

इसी तरह अमित शाह 2014 से 2020 तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। इस दौरान वे गुजरात के नरनपुरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। 2012 से 2017 तक वे विधायक और राष्ट्रीय अध्यक्ष—दोनों भूमिकाएं साथ निभाते रहे। बाद में वे राज्यसभा और फिर लोकसभा की राजनीति में आए।

क्या वही रास्ता अपनाएंगे नितिन नबीन?

इसी पृष्ठभूमि में अब नितिन नबीन का नाम चर्चा में है। पार्टी के अंदर यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि गडकरी और शाह जैसे नेता विधायक रहते हुए वर्षों तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रह सकते हैं, तो नितिन नबीन के लिए भी राज्यसभा जाना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।

भाजपा संगठन में पद और जनप्रतिनिधि पद को अलग-अलग संतुलित करने की रणनीति लंबे समय से अपनाई जाती रही है। ऐसे में पार्टी यह भी चाह सकती है कि नितिन नबीन फिलहाल अपने विधायक पद और संगठनात्मक जिम्मेदारी—दोनों को साथ लेकर चलें।

राज्यसभा समीकरण और भाजपा की रणनीति

बिहार से राज्यसभा की पांच सीटों के लिए होने वाले चुनाव में भाजपा को अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधने हैं। ऐसे में पार्टी किसी नए चेहरे, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखकर भी निर्णय ले सकती है।

यही वजह है कि नितिन नबीन का नाम भले चर्चा में हो, लेकिन अंतिम निर्णय तक कई समीकरण काम करते रहेंगे। फिलहाल इतना तय है कि भाजपा के भीतर ‘अमित शाह–गडकरी मॉडल’ की चर्चा ने इस बार राज्यसभा की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है।

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