अनंत अमित
हाल के वर्षों में भारत की आंतरिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहे हैं। विशेष रूप से पूर्वी सीमाओं से अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चर्चा होती रही है। इसी संदर्भ में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने बिहार के अररिया में सशस्त्र सीमा बल के कार्यक्रम में स्पष्ट संकेत दिया कि यदि पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो अवैध घुसपैठ के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और “एक-एक घुसपैठिये को चुन-चुनकर बाहर किया जाएगा।”
यह वक्तव्य केवल एक राजनीतिक घोषणा भर नहीं है, बल्कि भारत की सीमा सुरक्षा, आंतरिक स्थिरता और जनसांख्यिकीय संतुलन से जुड़े व्यापक विमर्श का हिस्सा भी है। अररिया में आयोजित कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने सशस्त्र सीमा बल के लिए लगभग 170 करोड़ रुपये की विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। इनमें सीमा चौकियों का निर्माण, बुनियादी ढांचे का विस्तार और सुरक्षा तंत्र को आधुनिक बनाने से जुड़े कार्य शामिल हैं।
भारत-नेपाल सीमा पर निगरानी को मजबूत करने के लिए भारत-नेपाल सीमा सड़क योजना के तहत 554 किलोमीटर लंबी सड़क को स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की त्वरित आवाजाही और निगरानी क्षमता को बढ़ाना है। खास बात यह है कि भारत-नेपाल सीमा लगभग 1750 किलोमीटर लंबी और अधिकांश हिस्सों में खुली सीमा है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती केवल अवैध आवागमन को रोकने की नहीं, बल्कि तस्करी, नारकोटिक्स और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों पर भी नजर रखने की होती है।
केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि अवैध घुसपैठ केवल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का मामला नहीं है, बल्कि यह आर्थिक संसाधनों, रोजगार और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। उनका कहना था कि अवैध घुसपैठिए गरीबों के लिए निर्धारित संसाधनों में हिस्सेदारी लेते हैं और स्थानीय युवाओं के अवसरों को भी प्रभावित करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक अनियंत्रित घुसपैठ किसी भी देश में जनसांख्यिकीय बदलाव का कारण बन सकती है, जिसका प्रभाव उस क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और सामाजिक संरचना पर पड़ता है। इसीलिए सरकार इस मुद्दे को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखती है।
केंद्रीय गृह मंत्री ने संकेत दिया कि बिहार के सीमांचल क्षेत्र से इस अभियान की शुरुआत की जा सकती है। सीमांचल लंबे समय से अवैध घुसपैठ और सीमा पार गतिविधियों को लेकर चर्चा में रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का मुद्दा अधिक गंभीर रूप से सामने आया है। उनके अनुसार यदि पश्चिम बंगाल में सरकार बदलती है तो सीमा पर बाड़ लगाने के काम को प्राथमिकता दी जाएगी और अवैध घुसपैठ के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया जाएगा।
सशस्त्र सीमा बल की भूमिका इस पूरे संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। कभी विशेष सेवा ब्यूरो के नाम से जाना जाने वाला यह बल आज भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमाओं की सुरक्षा का प्रमुख दायित्व निभा रहा है। वर्ष 2001 में भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा का दायित्व सशस्त्र सीमा बल को सौंपा गया था, जबकि वर्ष 2004 से भारत-भूटान सीमा की निगरानी भी इसी बल के जिम्मे है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और खुली सीमा की जटिलताओं के बावजूद सशस्त्र सीमा बल के जवान लगातार सीमा सुरक्षा और सीमांत गांवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में लगे हैं।
सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के लिए भी कई योजनाएँ शुरू की हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किया गया वाइब्रेंट विलेजेज कार्यक्रम सीमांत गांवों में बुनियादी ढांचा, कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसर बढ़ाने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के गांव खाली न हों और वहां रहने वाले लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़े रहें। यह रणनीति सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि मजबूत और विकसित सीमावर्ती समाज सीमा सुरक्षा का स्वाभाविक सहयोगी बनता है।
अवैध घुसपैठ और सीमा सुरक्षा का मुद्दा भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति के महत्वपूर्ण आयामों में से एक है। अररिया में दिया गया गृह मंत्री का वक्तव्य यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक बहस से आगे ले जाकर सुरक्षा, विकास और जनसांख्यिकीय संतुलन के व्यापक दृष्टिकोण से देख रही है। हालांकि इस विषय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि पूर्वी सीमाओं की सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण आने वाले वर्षों में भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया के प्रमुख विषय बने रहेंगे।


