सीआरपीएफ का मतलब है दुश्मन की पराजय की गारंटी

राजीव कुमार जैन

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ हमेशा से जटिल रही हैं। सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ देश के भीतर शांति, कानून-व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

सीआरपीएफ केवल एक अर्धसैनिक बल नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा और स्थिरता का प्रतीक है। चाहे वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्र हों, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने की चुनौती हो या देश के विभिन्न हिस्सों में चुनावों के दौरान शांतिपूर्ण वातावरण सुनिश्चित करना—हर मोर्चे पर सीआरपीएफ ने अपनी अद्वितीय क्षमता और साहस का परिचय दिया है।

विशेष रूप से वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ की भूमिका निर्णायक रही है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के जंगलों में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान चलाकर इस बल ने देश की सुरक्षा को नई मजबूती दी है। इसके अतिरिक्त, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी सीआरपीएफ की बहादुरी और पेशेवर दक्षता बार-बार साबित हुई है। सीआरपीएफ की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन, प्रशिक्षण और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा है। यही कारण है कि जब भी देश किसी संकट से जूझता है—चाहे वह आतंकी हमला हो, प्राकृतिक आपदा हो या कानून-व्यवस्था की चुनौती—सीआरपीएफ के जवान सबसे पहले मोर्चे पर खड़े दिखाई देते हैं।

भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में कुछ संस्थाएं ऐसी हैं, जिनकी भूमिका केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं बल्कि राष्ट्र की स्थिरता, एकता और विश्वास की आधारशिला बन जाती है। सीआरपीएफ ऐसी ही एक संस्था है, जिसने हर कठिन परिस्थिति में अपने साहस, अनुशासन और समर्पण से देश की सुरक्षा को सुदृढ़ किया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने हाल ही में सीआरपीएफ के योगदान का उल्लेख करते हुए कई महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि जब वामपंथी उग्रवादियों के हमले में कोलकाता में पुलिस के 78 जवानों की हत्या कर दी गई थी, तब भी सीआरपीएफ के जवानों ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। इसी प्रकार, 2001 में हुए वर्ष 2001 में संसद हमले के दौरान सीआरपीएफ के जवानों ने अदम्य साहस दिखाते हुए आतंकियों की साजिश को विफल कर दिया। इसके अतिरिक्त 2005 में राम जन्मभूमि परिसर पर हुए आतंकी हमले को भी सीआरपीएफ ने नाकाम कर दिया।

केंद्रीय गृह मंत्री का यह कथन कि “सीआरपीएफ के जवान कभी विफल नहीं होते” केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि उन अनगिनत बलिदानों और सफल अभियानों की स्वीकृति है जो इस बल के इतिहास में दर्ज हैं। जम्मू-कश्मीर में भी सीआरपीएफ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से 2019 में संविधान की धारा 370 हटाए जाने के बाद राज्य में शांति बनाए रखने में इस बल ने निर्णायक भूमिका निभाई। पत्थरबाज़ी की घटनाओं में भारी कमी आई, उद्योग और निवेश के अवसर बढ़े और विकास की नई संभावनाएं सामने आईं। इस परिवर्तन में सीआरपीएफ के साथ-साथ सीमा सुरक्षा बल और जम्मू—कश्मीर पुलिस का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

पूर्वोत्तर भारत में लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता को समाप्त कर शांति स्थापित करने में भी सीआरपीएफ की भूमिका सराहनीय रही है। विभिन्न शांति प्रक्रियाओं और सुरक्षा अभियानों के माध्यम से इस बल ने क्षेत्र में सामान्य जीवन की बहाली में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध लड़ाई में तो सीआरपीएफ की भूमिका और भी निर्णायक रही है। एक समय था जब देश के 12 राज्यों और अनेक जिलों में नक्सलवाद एक गंभीर चुनौती बन चुका था। केंद्र सरकार के दृढ़ संकल्प और सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों के तहत सीआरपीएफ और इसकी विशेष इकाई कोबरा ने इस चुनौती का डटकर सामना किया।

इसी क्रम में नक्सलवाद के खिलाफ चलाया गया आॅपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट उल्लेखनीय है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों और 45 डिग्री तापमान में लगातार 21 दिनों तक चले इस अभियान में सीआरपीएफ के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। गर्म पत्थरों वाली पहाड़ियों पर कठिन परिस्थितियों में भी एक इंच पीछे हटे बिना उन्होंने नक्सलियों के रणनीतिक ठिकानों को ध्वस्त कर दिया।

सीआरपीएफ का योगदान केवल आतंकवाद या उग्रवाद से लड़ाई तक सीमित नहीं है। देश के बड़े धार्मिक आयोजनों और जनसमूह वाले कार्यक्रमों में भी यह बल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। चाहे कुंभ मेला का विशाल आयोजन हो या अमरनाथ यात्रा जैसी कठिन और संवेदनशील तीर्थयात्रा—सीआरपीएफ के जवान हर समय सुरक्षा और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए तैनात रहते हैं।

दरअसल, सीआरपीएफ केवल एक सुरक्षा बल नहीं बल्कि राष्ट्र के विश्वास का प्रतीक है। इसके जवान कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते। यही कारण है कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में सीआरपीएफ का नाम साहस, समर्पण और सफलता का पर्याय बन चुका है। आज जब देश नई चुनौतियों और अवसरों के दौर से गुजर रहा है, तब सीआरपीएफ का यह संकल्प और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि राष्ट्र की सुरक्षा और शांति को किसी भी कीमत पर अक्षुण्ण रखा जाए। यही भावना इस बल को भारत की आंतरिक सुरक्षा का अडिग प्रहरी बनाती है।

 


(लेखक यूथ फॉर ह्यूमन राइट्स के अध्यक्ष हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published.