नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राजनयिक शशि थरूर एक बार फिर अपनी पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने अमेरिका–इज़रायल और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण संघर्ष पर भारत सरकार की ‘चुप्पी’ का बचाव करते हुए इसे “जिम्मेदार और परिपक्व कूटनीति” करार दिया है।
कूटनीति बनाम नैतिक बयानबाज़ी
‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे अपने लेख में थरूर ने स्पष्ट कहा कि विदेश नीति केवल आदर्शवादी सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि व्यावहारिकता और राष्ट्रीय हितों के संतुलन पर आधारित होती है। उन्होंने लिखा, “चुप रहना कायरता नहीं है, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय हितों और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन बनाने का तरीका है।”
थरूर ने स्वीकार किया कि इज़रायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में सवाल खड़े कर सकती है, लेकिन भारत का संयम डर नहीं बल्कि रणनीतिक सोच का परिणाम है।
कांग्रेस नेतृत्व से अलग राय
थरूर का यह बयान कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के रुख से अलग है। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर भारत के रुख को “नैतिक रूप से स्पष्ट” होने की जरूरत बताई थी, जबकि सोनिया गांधी ने सरकार की चुप्पी को “जिम्मेदारी से बचना” करार दिया था।
इसके विपरीत, थरूर ने कहा कि केवल सार्वजनिक निंदा करने से भारत के हित सुरक्षित नहीं होंगे, बल्कि इससे जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
‘उदारवादियों’ पर तीखा हमला
थरूर ने उन लोगों की भी आलोचना की, जो सरकार पर ‘नैतिक कायरता’ का आरोप लगाते हैं। उन्होंने ऐसे आलोचकों की तुलना “सर्कुलर फायरिंग स्क्वाड” से करते हुए कहा कि वे बिना परिणामों की परवाह किए केवल बयानबाज़ी में लगे रहते हैं।
उन्होंने लिखा, “विदेश नीति कोई अकादमिक सेमिनार नहीं है, जहाँ केवल आदर्शों की बात हो; यहाँ हर कदम के परिणाम होते हैं।”
ऐतिहासिक संदर्भ और व्यावहारिक दृष्टिकोण
थरूर ने शीत युद्ध के दौर का उदाहरण देते हुए बताया कि उस समय भारत ने सोवियत संघ के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने के लिए कई बार व्यावहारिक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि आज भी वही सिद्धांत लागू होते हैं—चाहे मामला यूक्रेन युद्ध का हो या ईरान पर हमलों का।
भारत के हित दांव पर
अपने लेख में थरूर ने यह भी चेताया कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। खाड़ी देशों के साथ भारत का लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और करीब 90 लाख भारतीयों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि जल्दबाज़ी में की गई कड़ी प्रतिक्रिया इन संबंधों को अस्थिर कर सकती है, जिससे रेमिटेंस, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
संतुलन की कूटनीति
थरूर के मुताबिक, भारत को ऐसी स्थिति में संतुलित रुख अपनाना चाहिए, जिससे सभी पक्षों के साथ संवाद के रास्ते खुले रहें। उन्होंने कहा, “जब हमारे पास मजबूत दबाव बनाने की स्थिति नहीं हो, तब चुप रहना भी एक रणनीतिक विकल्प हो सकता है।”
पहले भी दिखा चुके हैं अलग रुख
यह पहला मौका नहीं है जब थरूर ने अपनी पार्टी से अलग राय रखी हो। इससे पहले भी वे कई मुद्दों पर केंद्र सरकार के रुख की सराहना कर चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष मजबूती से रखते रहे हैं।
उनके इस ताज़ा बयान से जहां एक ओर कूटनीतिक सोच की बहस तेज हुई है, वहीं कांग्रेस के भीतर मतभेदों की चर्चा भी फिर से जोर पकड़ सकती है।

