समाज और राष्ट्र में सत्यं शिवं सुंदरम् की स्थापना ही संघ का उद्देश्य

कृष्णमोहन झा

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर के रेशम बाग स्थित श्री केशव स्मृति मंदिर में संघ के घोष पथक ( बैंड मंडली) इतिहास पर आधारित हस्तलिखित ग्रंथ ‘राष्ट्र स्वराधना’ के विमोचन समारोह के मंच से अपने उदबोधन में कहा कि संघ को अपने 100 साल के सफर में न तो किसी की कृपा की आकांक्षा रही न ही किसी की अव कृपा उसके सफर में कभी अवरोध पैदा कर सकी। स्वयंसेवकों के परिश्रम से संघ आज देश का दिशा दर्शन करने वाली ताकत बन चुका है। इसके बावजूद इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराने की संघ की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। वह अपने सभी कार्यों का श्रेय पूरे समाज को देना चाहता है। मोहन भागवत ने ‘राष्ट्र स्वराधना’ ग्रंथ को संघ के स्वयंसेवकों के लिए उपयोगी बताते हुए कहा कि इस ग्रंथ को पढ़ कर वे यह जान सकेंगे कि संघ ने पिछले 100 सालों में क्या किया है और आगे क्या करना चाहिए। संघ प्रमुख ने स्वयंसेवकों के परिश्रम की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने संघ की विचारधारा के अनुरूप राष्ट्रनिर्माण में समर्पित भाव से अपनी पूरी शक्ति लगाई है। इससे यह स्पष्ट है कि संघ केवल एक संगठन नहीं है बल्कि विचारधारा है जिसका मूल उद्देश्य समाज एवं राष्ट्र की सेवा करना है।मोहन भागवत ने कहा कि संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष को उत्सव के आयोजन नहीं बल्कि आत्मावलोकन के अवसर के रूप में देखना चाहिए। हमें पूर्वजों का स्मरण करते हुए और अधिक उन्नत स्थिति की ओर आगे बढने का प्रयास करना है। पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्यों को सुरक्षित रखते हुए उन्हें आगे बढाना स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी है।संघ प्रमुख ने समाज को संगठित करने के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु और अधिक संगठित और व्यापक प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसमें समाज की भी सहभागिता के महत्व को रेखांकित किया।

संघ प्रमुख ने घोष दल के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोष दल में विभिन्न वाद्य यंत्र होते हैं जिनके स्वर एवं ध्वनि अलग अलग होते हुए भी स्वयं सेवक एक ही ताल पर चलते हैं। इससे समन्वय एवं एकता की भावना मजबूत होती है। जब कोई कार्य मन से एवं पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है तो उसका परिणाम भी उसी रूप में प्रकट होता है और सत्य ं शिवं सुंदरम् की अनुभूति होती है।मोहन भागवत ने अपनी इस बात को रेखांकित किया कि समाज और राष्ट्र में सत्यं शिवं सुंदरम् की स्थापना ही संघ का उद्देश्य है। सरसंघचालक ने कहा कि संघ के सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य संस्कारों का निर्माण करना है। सुदृढ़ शरीर और संस्कारित मन के समन्वय से गुणवत्ता पूर्ण जीवन की ओर आगे बढ़ना ही लक्ष्य है। इस दृष्टि से ‘राष्ट्र स्वराधना’ का हस्तलिखित इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय बीत जाता है, कार्य खड़ा हो जाता है परन्तु मौलिक गुणवत्ता शुरुआत में थी उसे अंत तक बनाए रखना महत्वपूर्ण है। हमने विकट परिस्थिति में कार्य कैसे खड़ा किया और किस उद्देश्य से किया उसका सदैव स्मरण कराने का कार्य यह ग्रंथ करेगा। संघ प्रमुख ने कहा कि स्वयंसेवक पेशेवर गायक या वादक नहीं होते लेकिन अपने दैनिक कार्यों को संभालते हुए, बिना कागज सामने रखे इतनी सुंदर रचनाएं कैसे प्रस्तुत कर लेते हैं इस पर लोगों को आश्चर्य होता है परन्तु चमत्कार करना संघ का उद्देश्य नहीं होता ।वह तो अपने आप घटित हो जाता है। पूर्व स्वयं सेवकों के सद्गुण इन रचनाओं में मिलते हैं और दिखाई देते हैं। भाव तभी उत्पन्न होता है जब वादक पूरे मन से वादन करता है। इसे केवल एक कर्तव्य नहीं बल्कि अंतरात्मा से जुड़ी हुई बात समझ कर करना चाहिए।

(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

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