पश्चिम बंगाल के जनादेश ने राष्ट्रीय राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया

डॉ धनंजय गिरि

देश की राजनीति इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम ने न सिर्फ राज्य की सत्ता परिवर्तन की तस्वीर उकेरी है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को भी पूरी तरह बदलने के संकेत दिए हैं। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में अपने दम पर बहुमत वाली सरकार बनाने जा रही है। यह जीत केवल एक राज्य की सत्ता परिवर्तन भर नहीं होगी, बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े युगांतकारी बदलाव का संकेत मानी जाएगी। भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव में मैदान में उतरकर खुद मोर्चा संभाला। 15 दिन उन्होंने बंगाल में डेरा डाले रखा। यह श्री शाह की वह रणनीति थी, जिसका असर अब नतीजों में दिख रहा है।

इस संभावित जीत के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) शासित राज्यों की संख्या बढ़कर 21 हो जाएगी। भाजपा स्वयं 15 राज्यों में स्वतंत्र रूप से सत्ता में होगी, जबकि बिहार, आंध्र प्रदेश, नागालैंड और मेघालय में सहयोगी दलों के साथ गठबंधन सरकारें एनडीए के विस्तार को और मजबूती देंगी।

सबसे पहले पश्चिम बंगाल की बात करें, तो वहां के परिणाम के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का वह बयान अचानक राजनीतिक गलियारों में फिर चर्चा का विषय बन गया है, जो उन्होंने पिछले वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद दिया था। नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि गंगा नदी बिहार से होकर बंगाल में बहती है। बिहार की यह विजय उसी धारा की तरह बंगाल में भी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करेगी।

तब इस बयान को राजनीतिक उत्साह का प्रतीक माना गया था, लेकिन आज जब बंगाल में भाजपा ऐतिहासिक बढ़त बनाती दिख रही है, तो इसे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शी राजनीतिक भविष्यवाणी के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनावी रणक्षेत्र में यदि भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक बढ़त की पटकथा लिखी है, तो उसके सबसे प्रमुख रणनीतिक शिल्पकार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह माने जाएंगे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका बंगाल दौरा सामान्य चुनाव प्रचार अभियान नहीं, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक सैन्य अभियान की तरह था—जहां हर कदम नपा-तुला, हर संदेश लक्षित और हर गतिविधि सत्ता परिवर्तन के लक्ष्य से जुड़ी हुई थी।

अमित शाह का 15 दिनों तक पश्चिम बंगाल में लगातार डेरा डालना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि भाजपा इस चुनाव को केवल एक और राज्य चुनाव नहीं मान रही थी, बल्कि इसे राष्ट्रीय राजनीति के निर्णायक मोड़ के रूप में देख रही थी। शाह यहां केवल मंचीय भाषण देने नहीं आए थे; वे एक ऐसे वॉर रूम कमांडर की भूमिका में थे, जो जमीनी स्तर से लेकर रणनीतिक शीर्ष तक हर गतिविधि की निगरानी कर रहे थे। यह रणनीति हमें पिछले वर्ष के बिहार विधानसभा चुनाव की याद दिलाती है, जहां अमित शाह ने इसी प्रकार संगठनात्मक नियंत्रण और सूक्ष्म प्रबंधन के जरिए भाजपा-एनडीए की जीत सुनिश्चित की थी। बंगाल में भी वही मॉडल और अधिक आक्रामक व परिष्कृत रूप में देखने को मिला। उत्तर बंगाल, जंगलमहल, सीमावर्ती जिलों और औद्योगिक क्षेत्रों को विशेष प्राथमिकता दी गई। भाजपा ने पहले ही 100 से 120 ऐसी सीटों की पहचान कर ली थी जिन्हें जीतने योग्य माना गया, जबकि 80 से 100 सीटों को कड़ी प्रतिस्पर्धा वाली श्रेणी में रखा गया।

श्री अमित शाह के दौरे का पूरा कार्यक्रम इन्हीं सीटों के इर्द-गिर्द बुना गया। यह चुनावी राजनीति में संसाधनों के अत्यंत सटीक उपयोग का उदाहरण है। राजनीतिक दल अक्सर व्यापक प्रचार करते हैं, लेकिन भाजपा ने सीमित संसाधनों को अधिकतम प्रभाव वाले क्षेत्रों में केंद्रित कर परिणामोन्मुखी रणनीति अपनाई। विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि हर जोन में देर रात 1-2 बजे तक संगठनात्मक बैठकें होती थीं, जिनमें बूथ प्रभारी से लेकर जिला स्तर के नेताओं तक से सीधा संवाद होता था। यह दर्शाता है कि भाजपा की चुनावी मशीनरी केवल नारों पर नहीं, बल्कि डेटा, अनुशासन और जवाबदेही पर आधारित थी।

04 मई, 2026 की तारीख पश्चिम बंगाल के लिए बेहद अहम हो गया। यही वह तारीख है जिस दिन वहां की जनता ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों के लगातार शासन के अंत का जनादेश दिया। दरअसल, यह जनादेश कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सत्ता विरोधी लहर, कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर उठते सवाल, आरजी कर बलात्कार एवं हत्या प्रकरण जैसे मुद्दों का व्यापक असर, भाजपा की आक्रामक जमीनी रणनीति, सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं की निर्णायक भूमिका आदि।
नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी की जीत और भाबनीपुर में ममता बनर्जी को मिली चुनौती ने इस चुनाव को प्रतीकात्मक रूप से और अधिक ऐतिहासिक बना दिया है।

पांच वर्ष पहले तक बंगाल में भाजपा को सत्ता का गंभीर दावेदार नहीं माना जाता था। पार्टी की उपस्थिति सीमित थी और तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा लगभग अभेद्य माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने जिस तेजी से बंगाल में अपने संगठन का विस्तार किया, उसने राज्य की राजनीति की दिशा ही बदल दी। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता, केंद्रीय नेतृत्व की लगातार मौजूदगी और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की रणनीति ने भाजपा को यहां निर्णायक स्थिति में पहुंचा दिया।

जहां पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए उत्साहजनक खबर लेकर आया है, वहीं दक्षिण भारत ने विपक्षी राजनीति को मिश्रित संकेत दिए हैं। तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन सत्ता से बाहर होता दिख रहा है और अभिनेता-राजनेता विजय के नेतृत्व वाली तमिल वेट्री कज़गम (टीवीके) नई शक्ति बनकर उभरी है। विजय का उभार तमिल राजनीति में पारंपरिक द्रविड़ दलों के प्रभुत्व को चुनौती देता दिख रहा है। दूसरी ओर, केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) निर्णायक बढ़त बनाकर सरकार बनाने की ओर अग्रसर है। यह कांग्रेस के लिए राहत की खबर जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल बने हुए हैं।

असम गण परिषद के अध्यक्ष अतुल बोरा ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के प्रदर्शन पर भरोसा जताया और इसका श्रेय मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा किए गए विकास कार्यों को दिया।

इन चुनाव परिणामों ने केंद्र में भाजपा के खिलाफ बने इंडिया ब्लॉक के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। वर्तमान स्थिति में कांग्रेस केवल कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार रखती है। झारखंड में वह सहयोगी दल के रूप में सत्ता में है। पंजाब में आम आदमी पार्टी भाजपा विरोधी तो है, पर इंडिया ब्लॉक की औपचारिक संरचना से अलग है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार होती है, तो विपक्षी एकता की अवधारणा को सबसे बड़ा झटका लगेगा।

राज्यों में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच संविधान संशोधन को लेकर चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को संविधान संशोधन का अधिकार देता है। इसके तहत संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है। कुछ विशेष संशोधनों के लिए कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से अनुमोदन जरूरी होता है। यदि एनडीए का प्रभाव लगातार बढ़ता है, तो राष्ट्रीय नीति निर्माण और संवैधानिक बहसों पर इसका दूरगामी असर पड़ सकता है।

पश्चिम बंगाल के रुझान केवल चुनावी आंकड़े नहीं हैं; वे भारतीय राजनीति में बदलती जन-चेतना, नेतृत्व की स्वीकार्यता और राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत एक नए राजनीतिक अध्याय में प्रवेश कर चुका है कि जहां क्षेत्रीय किले ढह रहे हैं, राष्ट्रीय दलों का प्रभाव बढ़ रहा है और राजनीतिक स्थिरता का नया विमर्श आकार ले रहा है। बंगाल का फैसला शायद आने वाले दशक की भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा।


(लेखक चिंतक, विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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