अनंत अमित
बिहार की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों और जातीय संतुलन की जटिल बिसात पर चलती रही है। यहां सत्ता का गणित केवल विकास, प्रशासनिक अनुभव या राजनीतिक कौशल से तय नहीं होता, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों की हिस्सेदारी और उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं के समुचित प्रतिनिधित्व पर भी निर्भर करता है। ऐसे में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में गठित नई एनडीए सरकार की कैबिनेट केवल मंत्रियों की सूची भर नहीं है, बल्कि यह एक सुविचारित सामाजिक रणनीति का दस्तावेज प्रतीत होती है।
नई कैबिनेट का गठन स्पष्ट संकेत देता है कि बिहार में आगामी राजनीतिक संघर्ष सामाजिक संतुलन और व्यापक प्रतिनिधित्व के आधार पर ही लड़ा जाएगा। एनडीए ने मंत्रिमंडल विस्तार में लगभग हर प्रमुख जातीय और सामाजिक वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि गठबंधन समाज के हर तबके को साथ लेकर चलने की नीति पर काम कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने अपने हिस्से से सवर्ण, पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वर्गों को समाहित कर संतुलन साधने की कोशिश की है। वहीं जेडीयू ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार—विशेषकर कुर्मी, अति पिछड़ा और महादलित वर्ग—को मजबूत संदेश देने का प्रयास किया है। सहयोगी दलों को भी सम्मानजनक भागीदारी देकर गठबंधन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक साझेदारी को मजबूती देना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, अमित शाह, जेपी नड्डा, जीतन राम मांझी और चिराग पासवान, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा सहित कई गणमान्य व्यक्ति समारोह में उपस्थित थे। इंजीनियरिंग स्नातक निशांत कुमार, जो लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूर रहे हैं, ने जेडीयू नेतृत्व के लगातार आग्रह के बाद मंत्री पद की शपथ ली। खबरों के मुताबिक, निशांत कुमार ने शुरू में यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था, यह कहते हुए कि वे कोई भी औपचारिक पद स्वीकार करने से पहले एक समर्पित पार्टी कार्यकर्ता के रूप में अपनी साख साबित करना चाहते हैं।
243 सदस्यीय विधानसभा में 89 विधायकों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है और उसके 15 मंत्री हैं, जिन्होंने गुरुवार को शपथ ली। इनमें से अधिकतर वे मंत्री हैं जो पिछले साल नवंबर में एनडीए के विधानसभा चुनावों में शानदार वापसी के बाद नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में शामिल थे। जेडीयू के कुल 15 मंत्री हैं, जिनमें से 13 ने गुरुवार को गांधी मैदान में शपथ ली। विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने सम्राट चौधरी के साथ अप्रैल में शपथ ली थी और उन्हें उपमुख्यमंत्री नामित किया गया था।
बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई एनडीए सरकार की कैबिनेट ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि आने वाली राजनीतिक लड़ाई सामाजिक संतुलन और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहने वाली है। मंत्रिमंडल गठन में एनडीए ने लगभग हर प्रमुख जातीय और सामाजिक वर्ग को साधने की कोशिश की है। यह कैबिनेट केवल सत्ता का बंटवारा नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक इंजीनियरिंग का संदेश भी देती है।
नई सरकार में सबसे अधिक हिस्सेदारी भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई है। पार्टी ने अपने कोटे से सवर्ण, पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वर्ग के नेताओं को शामिल कर संतुलित प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है। ब्राह्मण समाज से नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी को जगह दी गई है, जबकि भूमिहार समाज से विजय कुमार सिन्हा और इंजीनियर कुमार शैलेन्द्र को प्रतिनिधित्व मिला है। यादव वोट बैंक को साधने के लिए रामकृपाल यादव को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।
अति पिछड़ा वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कानू समाज से केदार गुप्ता और मल्लाह समाज से रमा निषाद को मौका दिया गया है। इसे भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत पार्टी बिहार के विस्तृत सामाजिक आधार को अपने पक्ष में मजबूत करना चाहती है।
वहीं जनता दल (युनाइटेड) ने भी अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को मजबूत बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया है। कुर्मी समाज से निशांत कुमार और श्रवण कुमार को जगह मिली है। दलित समाज से अशोक चौधरी , सुनील कुमार और रत्नेश सदा को मंत्री बनाकर पार्टी ने महादलित और अनुसूचित जाति वर्ग को स्पष्ट संदेश दिया है। अल्पसंख्यक समाज से जमा खान को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इसके साथ ही मदन सहनी, शीला मंडल, दामोदर राउत और बुलो मंडल जैसे नेताओं को शामिल कर जेडीयू ने अति पिछड़ा वर्ग पर अपना विशेष फोकस बरकरार रखा है।
एनडीए के सहयोगी दलों को भी सत्ता में सम्मानजनक भागीदारी दी गई है। लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) की ओर से संजय पासवान और संजय सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जबकि संतोष मांझी को हिंन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रतिनिधि के तौर पर मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा आरएलएम कोटे से दीपक प्रकाश को शामिल कर गठबंधन ने अपने सहयोगी दलों को भी साधने का प्रयास किया है।
नई कैबिनेट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें दलित, महादलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, सवर्ण और अल्पसंख्यक—सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई देती है। विधानसभा चुनाव से पहले यह एनडीए की एक सुविचारित सामाजिक रणनीति है। साफ है कि सम्राट चौधरी की नई टीम केवल प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए नहीं, बल्कि बिहार की जटिल सामाजिक संरचना को साधकर चुनावी जमीन मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। नई कैबिनेट की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें केवल जातीय समीकरणों को साधने का प्रयास नहीं दिखता, बल्कि सामाजिक समावेशन का व्यापक संदेश भी निहित है। दलित, महादलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, सवर्ण और अल्पसंख्यक—सभी वर्गों की भागीदारी यह दर्शाती है कि बिहार की सत्ता अब बहुस्तरीय सामाजिक संतुलन के आधार पर अपने राजनीतिक भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रही है।
यह भी स्पष्ट है कि यह कवायद केवल प्रशासनिक दृष्टि से नहीं की गई है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे में यह कैबिनेट एनडीए की चुनावी रणनीति का मजबूत संकेतक बनकर उभरी है। बिहार जैसे राज्य में जहां सामाजिक पहचान राजनीतिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित करती है, वहां मंत्रिमंडल का यह स्वरूप चुनावी संदेश देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
हालांकि, सामाजिक संतुलन साध लेना ही पर्याप्त नहीं होगा। सरकार के सामने असली चुनौती इन प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की होगी। यदि यह टीम प्रशासनिक दक्षता, विकास और सुशासन के मोर्चे पर प्रभावी प्रदर्शन करती है, तभी यह सामाजिक संतुलन राजनीतिक सफलता में बदल पाएगा।
सम्राट सरकार की नई कैबिनेट ने फिलहाल यह संकेत अवश्य दे दिया है कि बिहार की राजनीति में सामाजिक इंजीनियरिंग अभी भी सबसे प्रभावशाली औजार है। अब देखना यह होगा कि यह संतुलन केवल राजनीतिक संदेश बनकर रह जाता है या वास्तव में राज्य के विकास और सामाजिक समरसता की नई इबारत लिखता है।


