क्या “जिंदा दफन” कर दिए गए हैं नीतीश कुमार?

पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सवाल सत्ता परिवर्तन से ज्यादा सत्ता के भीतर बदलते शक्ति संतुलन को लेकर उठ रहे हैं। पूर्व सांसद Anand Mohan द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री Nitish Kumar को लेकर दिया गया बयान राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ चुका है। यह बहस सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में वह बड़ा सवाल है—क्या जदयू में फैसले अब किसी और शक्ति केंद्र से लिए जा रहे हैं?

आनंद मोहन ने हालिया बयान में जिस तरह नीतीश कुमार की राजनीतिक सक्रियता और उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठाए, उसने जदयू के भीतर चल रही उन चर्चाओं को और हवा दे दी है जो लंबे समय से धीमी आवाज में कही जा रही थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति इस समय एक संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां चेहरा भले पुराना हो, लेकिन निर्णय लेने वाले हाथ बदलते दिख रहे हैं।

जदयू में उभरते नए शक्ति केंद्र

बीते कुछ वर्षों में जदयू के भीतर कुछ चेहरों का कद असाधारण रूप से बढ़ा है। इनमें सबसे प्रमुख नाम हैं Sanjay Jha और Rajiv Ranjan Singh

संजय झा का राजनीतिक सफर विशेष रूप से चर्चा का विषय रहा है। भाजपा पृष्ठभूमि से आने वाले संजय झा ने बेहद कम समय में जदयू संगठन और सत्ता दोनों में केंद्रीय भूमिका हासिल कर ली। एमएलसी से राज्यसभा तक और फिर पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पद तक पहुंचना यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर उनका प्रभाव लगातार बढ़ा है।

वहीं ललन सिंह, जिन्होंने एक दौर में खुलकर नीतीश कुमार को चुनौती दी थी, आज फिर पार्टी के निर्णायक चेहरों में शामिल हैं। यह बदलाव बताता है कि जदयू के भीतर पुराने समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।

अगर सब सामान्य था तो पद क्यों छोड़ा?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नीतीश कुमार पूरी तरह सक्रिय और स्वस्थ राजनीतिक नेतृत्व की स्थिति में थे, तो मुख्यमंत्री पद छोड़ने की नौबत क्यों आई?

राजनीतिक हलकों में यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि क्या यह स्वैच्छिक निर्णय था या परिस्थितियों से उपजा राजनीतिक दबाव? अगर पार्टी उत्तराधिकार की ओर बढ़ रही थी, तो फिर Nishant Kumar को सीधे नेतृत्वकारी भूमिका में क्यों नहीं लाया गया?

निशांत कुमार की राजनीतिक सक्रियता को लेकर कुछ समय पहले जिस तरह चर्चाएं तेज हुई थीं, उससे यह संकेत मिल रहा था कि जदयू एक “नियंत्रित उत्तराधिकार” मॉडल पर काम कर सकती है। लेकिन बाद में उन्हें केवल सीमित राजनीतिक भूमिका तक रखने की चर्चा ने कई सवाल खड़े कर दिए।

क्या पार्टी के भीतर कोई ऐसा प्रभावशाली समूह है जिसने इस संभावना को रोक दिया?

चेतन आनंद प्रकरण और बढ़ती नाराजगी

इसी क्रम में आनंद मोहन के बेटे Chetan Anand को मंत्री नहीं बनाए जाने का मामला भी चर्चा के केंद्र में है।

आनंद मोहन समर्थकों का दावा है कि चेतन आनंद को मंत्री बनाए जाने का संकेत स्वयं नीतीश कुमार की ओर से मिला था। लेकिन बाद में पार्टी के भीतर सक्रिय एक प्रभावशाली लॉबी ने पूरा समीकरण बदल दिया।

यही कारण है कि आनंद मोहन अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं।

उनकी नाराजगी को केवल व्यक्तिगत असंतोष कहकर खारिज करना आसान नहीं है, क्योंकि बिहार की राजनीति में आनंद मोहन आज भी एक प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक आधार रखते हैं।

आनंद मोहन की राजनीतिक अहमियत

बिहार की राजनीति में आनंद मोहन का नाम हमेशा बहस के केंद्र में रहा है। समर्थकों के बीच उनकी छवि एक संघर्षशील नेता की रही है।

उनसे जुड़े चर्चित कानूनी मामले को लेकर आज भी बिहार के एक बड़े वर्ग का मानना है कि वे राजनीतिक परिस्थितियों के शिकार बने।

राजनीति की विडंबना यह है कि जिन आनंद मोहन को कभी विवादास्पद राजनीति का प्रतीक बताया गया, उन्हीं के गांव जाकर नीतीश कुमार ने राजनीतिक संदेश दिया। उनकी पत्नी को लोकसभा टिकट मिला, बेटे चेतन आनंद को राजनीति में जगह मिली और गठबंधन की राजनीति में उन्हें महत्व भी दिया गया।

ऐसे में आज जब वही आनंद मोहन सवाल उठा रहे हैं, तो इसे सिर्फ नाराजगी नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

जदयू के भीतर दबा असंतोष

जदयू के भीतर असंतोष कोई नई बात नहीं है।

Shyam Rajak, हरिनारायण सिंह और संजय सिंह जैसे कई वरिष्ठ नेता लंबे समय से बड़ी जिम्मेदारियों की प्रतीक्षा में हैं। लेकिन पार्टी में कुछ नए चेहरों का तेज उभार यह संकेत देता है कि निर्णय अब अनुभव या वरिष्ठता से अधिक राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर लिए जा रहे हैं।

यही बदलाव पार्टी के भीतर खामोश असहजता पैदा कर रहा है।

शिवहर विवाद भी बढ़ा रहा सवाल

इधर Sheohar की राजनीति भी इन दिनों नए विवादों का केंद्र बनी हुई है।

विधायक और उनके डॉक्टर पति को लेकर टिकट वितरण से लेकर डिग्री विवाद तक कई सवाल उठे हैं। विरोधी दलों के साथ-साथ सत्ता पक्ष के भीतर भी यह चर्चा है कि टिकट देकर वापस लेने जैसे फैसले आखिर किन परिस्थितियों में हुए।

क्या यह भी अंदरूनी शक्ति संघर्ष का हिस्सा था?

असली सवाल—सरकार कौन चला रहा है?

बिहार की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश करती दिख रही है जहां सवाल “मुख्यमंत्री कौन है” से ज्यादा “सरकार कौन चला रहा है” पर केंद्रित हो गया है।

आनंद मोहन का बयान इसी बहस को और तेज करता है।

उन्होंने सीधे उस चुप्पी को चुनौती दी है जो लंबे समय से जदयू के भीतर दिखाई दे रही थी।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नीतीश कुमार वास्तव में सत्ता से दूर हो चुके हैं, या फिर उनके नाम पर कोई दूसरी राजनीतिक संरचना सक्रिय है?

और यदि ऐसा है, तो क्या जदयू अपने सबसे बड़े चेहरे के रहते हुए ही “पोस्ट नीतीश युग” में प्रवेश कर चुकी है?

फिलहाल इन सवालों का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति में उठ रही यह हलचल आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत बन सकती है।

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