हाल ही में नीट परीक्षा रद्द होने की खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। कारण बताया गया—पेपर लीक। यह कोई छोटी घटना नहीं है। यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य, उनकी मेहनत और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रहार है। जब कोई छात्र दो-दो, तीन-तीन साल तक दिन-रात मेहनत करता है और अंत में परीक्षा ही संदिग्ध हो जाए, तो यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि एक गहरी प्रणालीगत समस्या का संकेत है। यह एक शुद्ध देशद्रोह का मामला है ।
नीट जैसी परीक्षाओं का आयोजन करने वाली संस्था एक सरकारी निकाय है। आमतौर पर इस तरह की संस्थाओं के शीर्ष पर एक आईएएस या अन्य यूपीएससी-क्वालीफाइड अधिकारी को नियुक्त किया जाता है। यह माना जाता है कि ऐसे अधिकारी अत्यंत प्रतिभाशाली होते हैं और प्रशासनिक दृष्टि से सक्षम होते हैं। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या केवल प्रशासनिक योग्यता ही इतनी बड़ी और तकनीकी रूप से जटिल परीक्षाओं को निष्पक्ष और सुरक्षित ढंग से संचालित करने के लिए पर्याप्त है?
यूपीएससी-क्वालीफाइड अधिकारियों की पृष्ठभूमि विविध होती है। वे पहले बिजली विभाग, स्वास्थ्य विभाग, वन विभाग या किसी अन्य क्षेत्र में कार्य कर चुके होते हैं। अचानक उन्हें ऐसी संस्था की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है जहाँ उन्हें लाखों छात्रों की परीक्षा आयोजित करनी होती है। यदि नीट और जेईई जैसी परीक्षाओं को जोड़ दें, तो यह संख्या 20 लाख से भी अधिक हो जाती है। इतने बड़े स्तर पर परीक्षा आयोजित करना केवल प्रशासनिक काम नहीं है, बल्कि इसमें तकनीकी समझ, सुरक्षा प्रबंधन, डेटा हैंडलिंग और उच्च स्तर की प्रोफेशनल दक्षता की आवश्यकता होती है।
यह तर्क दिया जाता है कि इन अधिकारियों का काम करने का तरीका मुख्यतः “पीपल्स मैनेजमेंट” पर आधारित होता है। यानी वे लोगों को मैनेज करते हैं—कभी अधिकार दिखाकर, कभी दबाव बनाकर, तो कभी संबंधों का उपयोग करके। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इतने संवेदनशील और तकनीकी कार्य में केवल “लोगों को मैनेज करना” ही पर्याप्त है? क्या इसमें प्रोफेशनल स्किल, विशेषज्ञता और अनुभव की आवश्यकता नहीं है?
अक्सर यह भी आरोप लगाया जाता है कि इस पूरे तंत्र में प्रोफेशनल एथिक्स और पारदर्शिता की कमी होती है। यदि किसी सिस्टम में लंबे समय तक बेईमानी, घूसखोरी और चापलूसी जैसी प्रवृत्तियाँ बनी रहें, तो वह धीरे-धीरे उसकी कार्यसंस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसे माहौल में ईमानदारी और जवाबदेही की उम्मीद करना कठिन हो जाता है।
कार्यप्रणाली की बात करें तो शीर्ष अधिकारी अपने अधीनस्थों को काम सौंपते हैं, वे आगे अपने अधीनस्थों को, और अंततः वास्तविक काम क्लेरिकल स्टाफ के स्तर पर होता है। यदि इस पूरी श्रृंखला में कहीं भी ईमानदारी की कमी हो, तो पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है। पेपर लीक जैसी घटनाएँ इसी कमजोर कड़ी का परिणाम हो सकती हैं।
अब सवाल उठता है—क्या इतनी बड़ी परीक्षाओं को ईमानदारीपूर्वक आयोजित करना संभव है? इसका उत्तर स्पष्ट है—हाँ, संभव है। हमारे पास इसके उदाहरण भी हैं। आईआईटी की परीक्षाएँ वर्षों से आयोजित होती रही हैं, जिनमें लाखों छात्र शामिल होते हैं। 1997 में एक बार पेपर लीक की घटना हुई थी, लेकिन उसके बाद आईआईटी ने अपनी प्रणाली को इतना मजबूत किया कि फिर कभी ऐसी घटना सामने नहीं आई।
इसी प्रकार यूपीएससी स्वयं अपनी परीक्षाएँ आयोजित करता है, जिसमें एक मिलियन से अधिक अभ्यर्थी आवेदन करते हैं। इन परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर आज तक कोई गंभीर प्रश्नचिह्न नहीं लगा है। इसका मतलब साफ है—यदि इच्छाशक्ति हो और व्यवस्था मजबूत बनाई जाए, तो निष्पक्ष परीक्षा कराना पूरी तरह संभव है।
तो फिर समस्या कहाँ है? समस्या उस सोच में है जहाँ प्रोफेशनल स्किल और विशेषज्ञता को महत्व नहीं दिया जाता। जब किसी अत्यंत तकनीकी और संवेदनशील कार्य को केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो उसमें कमियाँ आना स्वाभाविक है। परीक्षा आयोजन केवल फाइलों और आदेशों का खेल नहीं है; यह एक जटिल ऑपरेशन है जिसमें साइबर सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, मानव संसाधन प्रबंधन और निगरानी प्रणाली का सटीक तालमेल आवश्यक होता है।
“पीपल्स मैनेजर” की अवधारणा को यदि एक उदाहरण से समझें, तो यह कुछ हद तक एक ठेकेदार के समान है। जैसे किसी भवन निर्माण में ठेकेदार मजदूरों को लाता है, उन्हें काम पर लगाता है और अपने प्रभाव से काम करवाता है। लेकिन क्या वह स्वयं इंजीनियर होता है? क्या उसे हर तकनीकी पहलू की गहरी समझ होती है? जरूरी नहीं। यही स्थिति यहाँ भी देखने को मिलती है।
जब नेतृत्व के स्तर पर प्रोफेशनल विशेषज्ञता की कमी होती है, तो सिस्टम केवल आदेशों और दबाव के सहारे चलता है। ऐसे में यदि नीचे के स्तर पर कोई गड़बड़ी होती है, तो उसे समय रहते पकड़ पाना कठिन हो जाता है। और जब गड़बड़ी सामने आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इसका सबसे बड़ा खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है। वे अपना समय, ऊर्जा और संसाधन लगाते हैं, लेकिन अंत में उन्हें निराशा और अनिश्चितता ही मिलती है। यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं है, बल्कि देश की प्रतिभा के साथ भी अन्याय है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक है कि परीक्षा आयोजन संस्थाओं में प्रोफेशनलिज़्म को प्राथमिकता दी जाए। तकनीकी विशेषज्ञों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और परीक्षा प्रबंधन के अनुभवी लोगों को नेतृत्व की भूमिका में लाया जाए। साथ ही, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मजबूत निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।
अंततः, यह समझना होगा कि परीक्षा केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लाखों सपनों की कसौटी है। इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि हम अपने युवाओं के भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें अपनी व्यवस्था को उतना ही मजबूत और विश्वसनीय बनाना होगा जितनी उनकी मेहनत और उम्मीदें हैं।
आवश्यक कदम
१. शिक्षा मंत्री को बर्खास्त करो
२. यूपीएससी को भंग करो
३. देश में प्रोफेशनल लोगों को जगह दो.
४. NTA मे आईआईटी के उन प्रोफेसर को हेड बनाओ जो JEE की परीक्षा सफलता पूर्वक कंडक्ट करबाते आ रहे हैं । See
(साभार : डॉ पद्मनाभ मिश्रा के फेसबुक वाल से।)

