‘नेपथ्य का रंगमंच’ : हिंदी रंगमंच के एक उपेक्षित लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष पर केंद्रित महत्वपूर्ण पुस्तक

नई दिल्ली। हिंदी रंगमंच की दुनिया में एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय पुस्तक ‘नेपथ्य का रंगमंच’ हाल ही में प्रकाशित हुई है। वरिष्ठ रंगकर्मी महेश आनंद और देवेंद्र राज अंकुर द्वारा संपादित इस पुस्तक ने रंगमंच के उस पक्ष को केंद्र में रखा है, जो किसी भी नाट्य प्रस्तुति की सफलता का आधार तो होता है, लेकिन अक्सर चर्चा और अध्ययन के केंद्र में नहीं आ पाता।

रंगमंच की किसी भी प्रस्तुति में नेपथ्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। दृश्य-सज्जा से लेकर प्रकाश, वेशभूषा, संगीत, मंच प्रबंधन और रूप-सज्जा तक अनेक ऐसे तत्व हैं, जिनके बिना नाटक की कल्पना भी संभव नहीं है। इसके बावजूद हिंदी में नेपथ्यकर्म पर गंभीर और व्यापक साहित्य अपेक्षाकृत कम उपलब्ध है। ऐसे में ‘नेपथ्य का रंगमंच’ इस कमी को दूर करने वाला एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल तकनीकी जानकारी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नेपथ्यकर्म के व्यावहारिक, रचनात्मक और वैचारिक पहलुओं पर भी गहन चर्चा करती है। पुस्तक में भारतीय रंगमंच की प्रतिष्ठित हस्तियों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के विचारों को शामिल किया गया है, जिससे पाठकों को विषय की व्यापक समझ विकसित करने में सहायता मिलती है।

पुस्तक में दृश्यबंध (सेट डिज़ाइन), दृश्यांकन, प्रकाश अभिकल्पन, वेशभूषा अभिकल्पन, रूपसज्जा, रंगसंगीत, मुखौटा निर्माण, मंच प्रबंधन और प्रस्तुति प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत आलेख संकलित किए गए हैं। ये लेख न केवल नेपथ्यकर्मियों के लिए उपयोगी हैं, बल्कि रंगमंच से जुड़े कलाकारों, निर्देशकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि रंगकर्म के विद्यार्थियों और थिएटर में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस पुस्तक का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह रंगमंच की संपूर्ण प्रक्रिया को समझने का एक सशक्त माध्यम बन सकती है।

सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के 284 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य 399 रुपये रखा गया है। विषय-वस्तु, प्रस्तुति और उपयोगिता को देखते हुए इसे हिंदी रंगमंच साहित्य की एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति माना जा रहा है।

‘नेपथ्य का रंगमंच’ न केवल रंगमंच के अदृश्य नायकों को पहचान दिलाने का प्रयास है, बल्कि यह हिंदी रंग साहित्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में भी अपनी जगह बनाती दिखाई देती है।

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