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Assam Politics : हेमंत विस्वसरमा की हठ के आगे झुकी भाजपा

कृष्णमोहन झा

असम में 2015 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हेमंत विस्वसरमा राज्य के पंद्रहवें मुख्यमंत्री बन गए हैं। भाजपा विधायक दल की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के प्रस्ताव पर उन्हें सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया। इस बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय पर्यवेक्षक के रूप में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और वरिष्ठ नेता अरुण सिंह मौजूद थे। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद हेमंत विस्वसरमा ने कहा कि वे पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के मार्गदर्शन में कार्य करेंगे और देश के पांच विकसित राज्यों के बीच असम के लिए स्थान सुरक्षित करना उनका प्रमुख लक्ष्य है।

सर्वानंद सोनोवाल को केंद्र में मंत्री पद का आफर दिया गया है गौरतलब है कि 2016 में असम में पहली बार गठित भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के पूर्व सोनोवाल केंद्र की मोदी सरकार में कौशल विकास तथा खेलकूद मंत्रालय में राज्य मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। हेमंत विस्वसरमा ने 2016 में संपन्न विधानसभा चुनावों में भाजपा नीत गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी परन्तु भाजपा ने तब उन्हें पार्टी में और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने के लिए आश्वस्त कर सोनोवाल को मुख्यमंत्री पद की बागडोर सौंपने का फैसला किया था। सोनोवाल के पांच वर्ष के कार्यकाल में उन पर कभी कोई ऐसे आरोप नहीं लगे जिनके कारण पार्टी को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा हो।

असम विधानसभा के चुनावों में ही भाजपा को यह अंदेशा हो गया था कि राज्य में लगातार दूसरी बार भाजपा के सत्ता में आने की स्थिति में हेमंत विस्वसरमा पुनः मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करने में कोई भी संकोच नहीं करेंगे और इस बार उन्हें सोनोवाल के पक्ष में अपनी दावेदारी से पीछे हटने के लिए मना पाना मुश्किल होगा इसीलिए हाल के चुनावों में पार्टी ने सोनोवाल को दुबारा भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने से परहेज़ किया था। उल्लेखनीय है कि राज्य विधानसभा के इन चुनावों में अपने निर्वाचन क्षेत्र से एक लाख से भी अधिक मतों से जीत का रिकार्ड बनाने वाले हेमंत विस्वसरमा को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाने के लिए नवनिर्वाचित 60 भाजपा विधायकों में से 42 विधायकों ने पार्टी के आला कमान को एक चिट्ठी भी लिखी थी। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सर्वानंद सोनोवाल और हेमंत विस्वसरमा को चर्चा हेतु दिल्ली बुलाया था।इस चर्चा में हेमंत विस्वसरमा जब मुख्यमंत्री पद की मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए तो सोनोवाल को मनाया गया और हेमंत विस्वसरमा राज्य के 15 वें मुख्यमंत्री बन गए। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि हेमंत विस्वसरमा को कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के लिए उपकृत करना वास्तव में पार्टी की मजबूरी बन गया था क्योंकि 2016 में भाजपा को पहली बार सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। असम विधानसभा के उस चुनाव में उन्हें भाजपा ने अपना चुनाव संयोजक की जिम्मेदारी सौंपी थी। असम की पिछली सोनोवाल सरकार में उन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का प्रभार सौंपा गया था। भाजपा ने उनके रणनीतिक कौशल और संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें उत्तर पूर्व प्रजातांत्रिक मोर्चे का संयोजक भी मनोनीत किया था। इस पद पर रहते हुए उन्होंने पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में भाजपा के जनाधार का विस्तार करने और पार्टी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान किया।राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित करने के बाद हेमंत विस्वसरमा ने कानून की पढ़ाई की और पांच वर्ष तक गोहाटी हाईकोर्ट में वकालत करने ‌के बाद उन्होंने 1996 में पहली बार जाबकतरी सीट से विधानसभा चुनाव लडा परंतु असम आंदोलन के नेता भृगु फूकन ने उन्हें हरा दिया। 2001के चुनाव में इसी सीट से उन्होंने भृगु फूकन को दस हजार मतों से हराकर अपनी हार का बदला ले लिया था उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

असम में जब तरुण गोगोई के पास कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री पद की बागडोर थी तब उन्होंने हेमंत विस्वसरमा को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर महत्वपूर्ण विभागों का प्रभार सौंपा था परंतु तरुण गोगोई से मतभेदों के चलते उन्होंने2014 में सरकार से इस्तीफा दे दिया था। बताया जाता है कि उसी दौरान उन्होंनेे जब कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात का समय मांगा था तो उन्हें इतनी अधिक देर तक इंतजार कराया गया कि नाराज होकर उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया। उस समय हेमंत विस्वसरमा का यह बयान भी काफी चर्चित हुआ था कि राहुल गांधी पार्टी के नेताओं से बातचीत करने के बजाय अपने कुत्तों से खेलना अधिक पसंद करते हैं। हेमंत विस्वसरमा कांग्रेस मेंअपमान का बदला लेने के लिए ही वे कांग्रेस से लगभग डेढ़ दशक का रिश्ता तोड़कर 2015 में‌ भाजपा में शामिल हुए थे। विस्वसरमा ने तब यह कहा था कि जब तक कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी का वर्चस्व है तब तक पार्टी में बगावत होती रहेगी। अगस्त 2015 में हेमंत विस्वसरमा ने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के निवास स्थान पर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली और इसके ही उन्होंने 2016 में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सरकार के पतन की पटकथा भी लिख दी।

असम के उन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सत्ता से विदाई हो गई और हेमंत विस्वसरमा राज्य में भाजपा का सबसे लोकप्रिय चेहरा बन गए। पूर्व मुख्यमंत्री सोनोवाल ने ऊपरी असम के उदारवादी आदिवासी नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई जबकि हेमंत विस्वसरमा पश्चिमी असम से आते हैं। सोनोवाल के विपरीत वे कट्टर हिंदुत्व में विश्वास रखते हैं। हेमंत विस्वसरमा ने हाल के विधानसभा चुनावों के दौरान कहा था कि असम में भाजपा को सत्ता में आने के मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन की आवश्यकता नहीं है। राज्य के शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने मदरसों को सरकारी मदद पर रोक लगाने की वकालत करते हुए कहा था कि सरकार केवल उन्हीं प्राइवेट मदरसों को संचालित किए जाने की अनुमति देगी जहां तकनीकी विषयों की पढ़ाई भी कराई‌ जावेगी। अपनी कट्टरपंथी विचारधारा के कारण असम में विस्वसरमा ने हिंदू मतदाताओं का समर्थन अर्जित ‌करने में सफलता अर्जित की। भाजपा को उम्मीद है कि विस्वसरमा को मुख्यमंत्री की बागडोर सौंपने से पश्चिमी असम सहित आसपास के राज्यों में पार्टी का जनाधार मजबूत होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि असम के मुख्यमंत्री पद की बागडोर ह हेमंत विस्वसरमा को सौंपने से पार्टी को उनके रणनीतिक कौशल और संगठन क्षमता का लाभ तीन साल साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में भी मिलेगा। उत्तरपूर्व प्रजातांत्रिक मोर्चे के संयोजक के रूप में उन्होंने उत्तर पूर्व के राज्यों में पार्टी को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है।यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं से भी उनके अच्छे संबंध हैं।
असम के मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभालते ही हेमंत विस्वसरमा ने जो विचार व्यक्त किए हैं उनसे यह संदेश मिलता है कि वे राज्य में लंबे समय से सक्रिय विद्रोही गुटों से बात चीत करने के लिए तैयार हैं। राज्य में शांति बहाली के लिए उन्होंने विशेष रूप से उल्फा के नेता परेश बरुआ से बातचीत की टेबल पर आने की अपील करते हुए कहा है कि अपहरण और हत्याओं से समस्या के समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती।अब यह देखना है कि हेमंत विस्वसरमा की इस अपील का विद्रोही गुटों पर क्या असर होता है। असम में सी ए ए और एन आर सी विधानसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने कहा था कि वह अगर सत्ता में आती है तो राज्य में इन्हें लागू नहीं किया जायेगा। हेमंत विस्वसरमा मानते हैं कि कांग्रेस गठबंधन की हार के बाद भी यह मुद्दा अभी समाप्त नहीं हुआ है। हेमंत विस्वसरमा ने कहा ‌है कि उनकी सरकार ने सीमावर्ती जिलों में एन आर सी के 20 प्रतिशत नामों और शहरी क्षेत्रों में 10 प्रतिशत नामों का सत्यापन कराने के पक्ष में है। अगर इसमें बेहद नगण्य विसंगतियां पाई जाती हैं तो वह इस मामले में आगे बढ़ेगी लेकिन मुख्यमंत्री यह मानते हैं कि ज्यादा विसंगतियां पाए जाने पर अदालत संज्ञान लेगी।
इसमें दो राय नहीं हो सकती कि हेमंत विस्वसरमा पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की भांति उदारवादी नेता नहीं हैं उनकी छवि कट्टर हिंदुत्व में विश्वास रखने वाले नेता की रही है परंतु अब यह उत्सुकता का विषय है कि अपनी इसी विचारधारा के साथ वे असम के लिए देश के शीर्ष पांच राज्यों की कतार में स्थान सुरक्षित करने के अपने लक्ष्य को अर्जित करने के लिए उन्होंने अपने मन में कौन सा रोड मेप तय कर रखा है।

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के सलाहकार है)

टीम डिजिटल

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