कचरे से कमाई का रास्ता: नाबार्ड की बैठक में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल पर बनी रणनीति, दिल्ली के लिए तैयार होगा सतत विकास रोडमैप

नई दिल्ली। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के नई दिल्ली क्षेत्रीय कार्यालय ने दिल्ली-एनसीटी के लिए पहली क्षेत्रीय सलाहकार समिति (RAC) की बैठक आयोजित कर कचरा प्रबंधन को आर्थिक अवसर में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। 12 जून 2026 को आयोजित इस बैठक में सरकार, वित्तीय संस्थानों, शिक्षण संस्थानों और विकास साझेदारों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और दिल्ली को स्वच्छ, स्मार्ट तथा सतत बनाने के लिए “कचरे से संपदा” आधारित मॉडल पर व्यापक चर्चा की।

बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय में स्ट्रैटेजिक एलायंस की निदेशक डॉ. सपना पोती ने की। इस अवसर पर नाबार्ड, नई दिल्ली क्षेत्रीय कार्यालय के मुख्य महाप्रबंधक श्री नवीन कुमार राय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक एवं मौद्रिक नीति समिति के सदस्य प्रो. राम सिंह, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के निदेशक एवं कुलपति डॉ. च. श्रीनिवास राव, एक्सिम बैंक के मुख्य महाप्रबंधक टी.डी. शिवकुमार, एसएलबीसी दिल्ली के संयोजक डी. साहू सहित आईआईटी दिल्ली, केवीके, आईसीएआर, एनआईआरडीपीआर और अन्य प्रमुख संस्थानों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

कचरे को समस्या नहीं, संसाधन मानने की जरूरत

बैठक का विषय था— “स्मार्ट और सतत दिल्ली के लिए नवाचार, स्थिरता और कौशल: कचरे से संपदा आधारित उद्यम”। विशेषज्ञों ने कहा कि कचरे को केवल निपटान की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है।

दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 11,862 टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है। गाजीपुर, भलस्वा और ओखला जैसे लैंडफिल स्थलों पर वर्षों से जमा कचरा एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। हालांकि वर्तमान में लगभग 70 प्रतिशत कचरे का प्रसंस्करण किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कुल कचरे का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आर्थिक मूल्य रखता है, जिसे सही तकनीक और प्रबंधन के जरिए उपयोग में लाया जा सकता है।

स्रोत पर पृथक्करण और वैल्यू चेन मॉडल पर जोर

नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक नवीन कुमार राय ने कहा कि नवाचार और उसके वास्तविक उपयोग के बीच मौजूद अंतर को पाटने के लिए पायलट परियोजनाओं, इन्क्यूबेशन सहायता और सफल तकनीकों के विस्तार की आवश्यकता है।

उन्होंने कचरा प्रबंधन के लिए वैल्यू चेन आधारित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की। इसके तहत ई-वेस्ट, प्लास्टिक कचरा, निर्माण एवं विध्वंस कचरा, बागवानी अपशिष्ट और बाजार से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर उनका वैज्ञानिक प्रसंस्करण किया जा सकता है।

उन्होंने मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों से खाद और अगरबत्ती बनाने तथा पुराने कपड़ों को पुनर्चक्रित कर बैग और दरियां तैयार करने जैसे उदाहरण प्रस्तुत किए। उनका मानना है कि स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से इन गतिविधियों को बड़े स्तर पर रोजगार और आय सृजन के मॉडल में बदला जा सकता है।

विज्ञान और तकनीक से मिलेगी नई दिशा

डॉ. सपना पोती ने बताया कि प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार का कार्यालय विभिन्न मंत्रालयों, उद्योगों और शिक्षण संस्थानों के सहयोग से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित नवाचारों को बढ़ावा दे रहा है।

उन्होंने “मंथन” प्लेटफॉर्म का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उद्योगों की जरूरतों को नवाचारकर्ताओं और स्टार्टअप्स से जोड़ने का कार्य करता है तथा इससे 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की परियोजनाएं जुड़ी हुई हैं।

उन्होंने “उत्थान”, “स्मार्ट विलेज सेंटर” और “सक्षम” जैसे कार्यक्रमों का भी जिक्र किया, जिनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों, शैक्षणिक संस्थानों और विद्यालय स्तर पर नवाचार को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि देश में तकनीक की कमी नहीं है, बल्कि चुनौती यह है कि उपलब्ध तकनीकों को जमीनी स्तर तक पहुंचाया जाए।

सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में बड़ा कदम

दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक प्रो. राम सिंह ने कहा कि “वेस्ट टू वेल्थ” को केवल कचरा प्रबंधन कार्यक्रम नहीं, बल्कि सर्कुलर इकोनॉमी का हिस्सा माना जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत कई महत्वपूर्ण संसाधनों और खनिजों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में ई-वेस्ट, प्लास्टिक, बैटरियों और जैविक कचरे से मूल्यवान संसाधनों की पुनर्प्राप्ति देश की आर्थिक और पर्यावरणीय जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि दिल्ली के कचरे में लगभग 50 प्रतिशत जैविक पदार्थ, 35 प्रतिशत पुनर्चक्रण योग्य सामग्री और शेष निष्क्रिय तत्व शामिल हैं। कम्पोस्टिंग, रिसाइक्लिंग, बायो-सीएनजी और वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजनाओं के माध्यम से इस कचरे का अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकता है।

वित्तीय संस्थानों और नगर निकायों की अहम भूमिका

बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि कचरे से संपदा आधारित मॉडल को सफल बनाने में बैंकों और वित्तीय संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

एसएलबीसी के माध्यम से विभिन्न बैंकों ने ऐसे स्टार्टअप्स, उद्यमों और स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई, जो कचरा प्रबंधन को आय और रोजगार के स्रोत में बदलने का काम कर रहे हैं।

इसके साथ ही नगर निगमों और स्थानीय निकायों की सक्रिय भागीदारी को भी आवश्यक बताया गया। बुनियादी ढांचे के विकास, परियोजनाओं के क्रियान्वयन और नगर निगम बॉन्ड जैसे वित्तीय मॉडलों के उपयोग पर भी चर्चा हुई।

हरित रोजगार और स्वच्छ दिल्ली की दिशा में संकल्प

बैठक के अंत में सभी हितधारकों ने इस बात पर सहमति जताई कि चर्चा को केवल विचार-विमर्श तक सीमित न रखकर उसे धरातल पर उतारा जाए। पायलट परियोजनाओं को आगे बढ़ाने, ऋण सुविधाओं को मजबूत करने और कचरे से संपदा आधारित उद्यमों को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल प्रभावी ढंग से लागू होता है तो दिल्ली न केवल अपनी कचरा समस्या का समाधान कर सकेगी, बल्कि हरित रोजगार, उद्यमिता और सतत विकास के नए अवसर भी पैदा कर सकेगी। इससे राजधानी को स्वच्छ, हरित और आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बनाने में मदद मिलेगी।

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