भारतीय ‘स्व’ की खोज और पुनर्स्थापना का घोष

नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के सर शंकर लाल सभागार में अरबिंदो कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डाॅ. प्रशांत बड़थ्वाल की पुस्तक Decolonising the Bhartiya Minds : From Colonial roots to Cultural Marxism का विमोचन समारोह आयोजित किया गया । इस पुस्तक के लोकार्पण ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में अब एक नई बौद्धिक बहस शुरू होगी । इस समारोह में कुलपति प्रो. योगेश सिंह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख श्री रामलाल , दूरदर्शन न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार श्री अशोक श्रीवास्तव, डीयू के कुलसचिव डॉ. विकास गुप्ता आदि ने पुस्तक का लोकार्पण किया । कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों के प्राचार्य , शिक्षक , शोधार्थी व छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया । इनमें प्रो. अरुण कुमार चौधरी , प्रोफेसर हंसराज सुमन , प्रोफेसर निरंजन कुमार , प्रो.संजय कुमार , डॉ.प्रवेश चौधरी , डॉ.शशिकांत , डॉ. कुलदीप कुमार , डॉ. अविनाश नेगी के साथ अनेक शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि भारतीयता, सांस्कृतिक स्वाभिमान और मानसिक स्वतंत्रता के प्रश्न आज पुनः केंद्र में आ चुके हैं। इस अवसर पर मंच का शानदार संचालन डॉ. शिवमंगल कुमार ने किया ।

पुस्तक के लेखक ने लोकार्पण के पश्चात अपने संबोधन में कहा कि यह बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई कि पश्चिमी धारणा की तरह भारत एक राष्ट्र-राज्य भर नहीं है, बल्कि वह हजारों वर्षों से प्रवाहित एक ऐसी सांस्कृतिक चेतना है, जिसने मानव सभ्यता को ज्ञान, अध्यात्म, दर्शनसह-अस्तित्व और सार्वभौमिक कल्याण का मार्ग दिखाया है। भारतीय सभ्यता की आत्मा उसकी विविधता, उसकी आध्यात्मिक दृष्टि और उसके “ स्व ” में निहित है। किंतु उपनिवेशवाद के लंबे कालखंड ने भारतीय समाज की मानसिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाला। अंग्रेज़ी शासन ने केवल भारत आर्थिक-राजनीतिक संरचना को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि भारतीय मन, विचार, शिक्षा और आत्मबोध को भी एक विशेष दिशा में ढालने का प्रयास किया। यही कारण है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बाद भी भारतीय समाज अनेक स्तरों पर मानसिक उपनिवेशवाद से जूझता दिखाई देता है। ऐसे समय में पुस्तक को भारतीय बौद्धिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए। निस्संदेह यह कृति भारतीय समाज को बारंबार आत्मचिंतन करने पर जोर देती है। डिकाॅलोनाइजेशन यानी वि-उपनिवेशवाद – औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति है, जो आज विश्व के अनेक देशों में चर्चा का विषय है, किंतु भारत के संदर्भ में इसका महत्व और अधिक गहरा हो जाता है। क्योंकि भारत पर केवल राजनीतिक शासन नहीं किया गया, बल्कि यहाँ की ज्ञान परंपरा, शिक्षा व्यवस्था, भाषाई गौरव और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को भी व्यवस्थित रूप से कमजोर करने का प्रयास हुआ। अंग्रेज़ी शिक्षा नीति का उद्देश्य ऐसे भारतीय तैयार करना था जो रंग और शरीर से भारतीय हों, किंतु विचार और चेतना से पश्चिमी दृष्टिकोण के वाहक बन जाएँ। इस मानसिकता का प्रभाव आज भी भारतीय शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक विमर्श में देखा जा सकता है। डॉ. प्रशांत ने अपनी पुस्तक के माध्यम से इसी प्रश्न को गंभीरता से उठाया है कि क्या भारत वास्तव में स्वतंत्र हो पाया है यदि उसकी सोच, उसकी शिक्षा और उसकी आत्मधारणा अब भी औपनिवेशिक दृष्टिकोण से संचालित हो रही है ? यह प्रश्न केवल बौद्धिक बहस का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल प्रश्न है। जब कोई समाज स्वयं को दूसरों की दृष्टि से देखने लगता है, तब उसका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। भारत के साथ भी यही हुआ। भारतीय ज्ञान परंपरा को पिछड़ा और अवैज्ञानिक सिद्ध करने का प्रयास किया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत ने गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन, योग और अध्यात्म के क्षेत्र में विश्व को अनमोल योगदान दिया है।

पुस्तक पर चर्चा करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह का वक्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण था। उन्होंने इस पुस्तक को भारतीय चेतना के पुनर्जागरण के महायज्ञ में एक महत्वपूर्ण आहुति बताया। यह केवल एक औपचारिक प्रशंसा नहीं थी, बल्कि एक गहरी वैचारिक स्वीकारोक्ति थी कि भारत की शिक्षा व्यवस्था को अब आत्मकेंद्रित और भारतीय दृष्टि आधारित बनाने की आवश्यकता है। प्रो. योगेश सिंह ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को यह संदेश दिया कि भारतीयता को समझना केवल अतीत की गौरवगाथा का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का आधार है । एक कुलपति के रूप में उनका यह दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है क्योंकि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली संस्थाएँ नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक दिशा निर्धारित करने वाले केंद्र होते हैं।

प्रो.योगेश सिंह ने आगे कहा कि आज भारत में नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा आधारित शिक्षा और सांस्कृतिक अध्ययन पर जो बल दिया जा रहा है, वह इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा है। लंबे समय तक भारतीय शिक्षा प्रणाली पश्चिमी मॉडल की नकल करती रही, जिसके कारण विद्यार्थी अपनी जड़ों से कटते गए। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्ति तक सीमित हो गया, जबकि भारतीय परंपरा में शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य के समग्र विकास और समाज के कल्याण से जुड़ा था। डॉ. प्रशांत की पुस्तक इसी खोई हुई दृष्टि को पुनः स्थापित करने का प्रयास करती है।

पुस्तक लोकार्पण समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल जी ने भारत को जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि यदि भारत अपने मूल सांस्कृतिक मूल्यों और आध्यात्मिक दृष्टि को पुनः आत्मसात कर ले, तो वह पुनः विश्वगुरु बन सकता है। उनके वक्तव्य का मूल संदेश यह था कि भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक प्रगति में नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक आत्मा में निहित है। आधुनिक विश्व आज जिस प्रकार नैतिक संकट, मानसिक तनाव, हिंसा और उपभोक्तावाद से जूझ रहा है, वहाँ भारतीय दर्शन की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। योग, ध्यान, वसुधैव कुटुम्बकम् और सह-अस्तित्व की भारतीय अवधारणाएँ आज वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन रही हैं।

दूरदर्शन न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने इस पुस्तक को भारतीय बौद्धिक विमर्श का मील का पत्थर बताया। उनका यह कथन अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है क्योंकि यह पुस्तक केवल इतिहास की पुनर्व्याख्या नहीं करती, बल्कि वर्तमान भारत की मानसिक संरचना को समझने का प्रयास करती है। भारतीय समाज लंबे समय तक इस भ्रम में रहा कि आधुनिकता का अर्थ पश्चिमीकरण है। परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं, परंपराओं और ज्ञान प्रणालियों को हीन दृष्टि से देखा जाने लगा। किंतु आज एक नई पीढ़ी यह समझ रही है कि आधुनिकता और भारतीयता परस्पर विरोधी नहीं हैं। भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए भी आधुनिक और प्रगतिशील हो सकता है।

इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह भारतीयता को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं बाँधती। भारतीयता यहाँ एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक अवधारणा के रूप में सामने आती है, जो विविधता, सहिष्णुता और आत्मबोध पर आधारित है। भारत की सभ्यता ने सदैव संवाद, समन्वय और सह-अस्तित्व को महत्व दिया है। यही कारण है कि यहाँ विभिन्न भाषाएँ, परंपराएँ, धर्म और जीवन पद्धतियाँ सहस्राब्दियों से साथ-साथ विकसित होती रही हैं। भारतीयता का वास्तविक अर्थ इसी बहुलता में निहित है। समकालीन भारत के संदर्भ में यह विमर्श इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज वैश्वीकरण और डिजिटल युग के प्रभाव में सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न और अधिक जटिल हो गया है। नई पीढ़ी सूचना और तकनीक के माध्यम से विश्व से जुड़ रही है, किंतु साथ ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर भी होती जा रही है। ऐसे समय में यह पुस्तक केवल वैचारिक पाठ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दिशा-सूचक का कार्य करती हैं। यह पुस्तक युवाओं को यह समझाने का प्रयास करती है कि आत्मविश्वास का आधार अपनी जड़ों की पहचान में निहित होता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मानसिक उपनिवेशवाद केवल भाषा या शिक्षा तक सीमित नहीं होता। यह हमारी जीवन शैली, सौंदर्यबोध, ऐतिहासिक समझ और आत्ममूल्यांकन को भी प्रभावित करता है। जब कोई समाज अपनी परंपराओं को हीन समझने लगे और बाहरी मानकों को ही श्रेष्ठ मानने लगे, तब उसकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता संकट में पड़ जाती है। भारत में लंबे समय तक यही स्थिति रही। किंतु अब एक नई वैचारिक जागृति दिखाई दे रही है, जहाँ भारतीय समाज अपने अतीत को नए दृष्टिकोण से समझने का प्रयास कर रहा है।

कुलपति प्रो. योगेश सिंह की भूमिका यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने केवल औपचारिक रूप से पुस्तक का विमोचन नहीं किया, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में इसकी आवश्यकता को रेखांकित किया। एक विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनका यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण संदेश देता है कि भारतीय विश्वविद्यालयों को अब केवल पश्चिमी सिद्धांतों के अनुकरण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और स्वदेशी दृष्टिकोण को भी समान महत्व देना चाहिए। यदि विश्वविद्यालय भारतीय समाज की वास्तविक आवश्यकताओं और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ेंगे, तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा। इस पुस्तक विमोचन समारोह ने यह भी सिद्ध किया कि आज भारत में बौद्धिक विमर्श केवल अकादमिक परिसरों तक सीमित नहीं है। पत्रकार, शिक्षाविद, विद्यार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता सभी इस चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि किसी भी समाज का पुनर्जागरण तभी संभव होता है जब उसकी बौद्धिक चेतना जागृत हो। भारत का भविष्य केवल आर्थिक विकास से निर्धारित नहीं होगा, बल्कि इस बात से भी तय होगा कि वह अपनी सांस्कृतिक आत्मा और वैचारिक स्वतंत्रता को किस प्रकार पुनः स्थापित करता है।

कुलसचिव डॉ.विकास गुप्ता ने पुस्तक के लेखक को बधाई दी और कहा कि भारतीय राजनीति में जिस तरह से परिवर्तन हो रहे हैं , उनकी ओर यह पुस्तक संकेत देती है । केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय आत्मचेतना का घोष है। यह भारतीय समाज को अपने स्व की ओर लौटने का आह्वान करती है। डॉ. प्रशांत ने जिस गंभीरता और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ इस विषय को प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय है। वहीं प्रो. योगेश सिंह जैसे शिक्षाविदों का समर्थन यह संकेत देता है कि भारत की शिक्षा और बौद्धिक दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आरंभ हो चुका है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय समाज इस विमर्श को केवल एक वैचारिक बहस के रूप में न देखे, बल्कि इसे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से जोड़े। भारत तब ही वास्तविक अर्थों में विश्वगुरु बन सकेगा जब वह अपनी सांस्कृतिक आत्मा, अपने ज्ञान और अपने स्वाभिमान को पुनः पहचान सकेगा। मानसिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है, और यही संदेश इस पुस्तक तथा उसके विमोचन समारोह ने पूरे समाज को दिया है।

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