पश्चिम बंगाल में भय की ‘हार’ भरोसे की ‘जीत’

कृष्णमोहन झा

 

पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर में ममता बनर्जी का किला ढह चुका है।भारतीय जनता पार्टी (पूर्ववर्ती जनसंघ) के संस्थापक स्व.डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृहराज्य पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनावों में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल करके इतिहास रच दिया है।पश्चिम बंगाल विधानसभा के अभूतपूर्व चुनावों के अब तक घोषित नतीजों से भाजपा को जो अभूतपूर्व खुशी हो रही होगी उसे समझना कठिन नहीं है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के इन चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था इसलिए भाजपा शासित 19 राज्यों के मुख्यमंत्रियों,सैकड़ों पार्टी पदाधिकारियों और हजारों ,कार्यकर्ताओं की फौज ने पार्टी को पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता की दहलीज तक पहुँचाने के लिए रात दिन एक कर दिये थे। राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं ही पार्टी के चुनाव अभियान की बागडोर संभाल रखी थी।देश के किसी राज्य में चुनाव प्रक्रिया के दौरान उपद्रवी तत्वों पर अंकुश लगाने के लिए चप्पे चप्पे पर सुरक्षा बलों की इतनी बड़ी संख्या में तैनाती भी संभवत:पहले कभी नहीं की गई होगी। कहने का तात्पर्य यह कि इतनी ऐहतियात बरतने के बाद राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनने में संशय की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी।राज्य में दूसरे और अंतिम चरण का मतदान समाप्त होने के तत्काल बाद जब 8 में से 6 एजेंसियों ने अपने एक्जिट पोल में भाजपा को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी कर दी तब अनेक राजनीतिक विश्लेषकों ने भी उसे अतिशयोक्ति मान कर यह राय व्यक्त की थी कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का ऐसा पराभव संभव नहीं है लेकिन चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया है कि ममता बनर्जी अपनी सरकार के विरुद्ध जनता में तेजी से बढते असंतोष का अंदाज़ा लगाने में चूक गई ं।ममता बनर्जी राज्य में गत डेढ़ दशकों से सत्तारूढ़ अपनी पार्टीतृणमूल कांग्रेस की शोचनीय पराजय के लिए भले ही एस आई आर को जिम्मेदार ठहराएं लेकिन इस कड़वी हकीकत से उन्हें मुंह नहीं मोड़ना चाहिए कि पिछले पांच सालों में चरम पर पहुंची एंटी इंकम्बेसी ने उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर का दरवाजा दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ममता बनर्जी को पूरी विनम्रता के साथ अब यह स्वीकार करने का साहस दिखाना चाहिए कि गत पांच सालों में उजागर हुए भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों और नेताओं की संलिप्तता , संदेश खाली में महिलाओं के शारीरिक शोषण के आरोप, आरजीकर मेडिकल कालेज में महिला डाक्टर की बलात्कार के बाद हत्या सहित राज्य के विभिन्न भागों में महिला उत्पीड़न की घटनाएं, तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की निरंकुशता और युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी जैसे कारकों ने उनके पांव के नीचे की जमीन छीन ली।

पश्चिम बंगाल विधानसभा के इन चुनावों में जब 92 प्रतिशत से अधिक का रिकार्ड मतदान हुआ उसी समय यह संकेत मिल गये थे कि इस बार मतदाताओं ने निर्भय होकर मतदान किया जिसका श्रेय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जाता है जिन्होंने राज्य में एक पखवाड़े से अधिक समय तक मौजूद रहकर मतदाताओं के मन में बैठे उस डर को निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मतदान की तारीख के पहले से ही बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती ने मतदाताओं के मन में यह भरोसा जगाया कि अब उन्हें तृणमूल कांग्रेस के निरंकुश कार्यकर्ताओं से डरने की आवश्यकता नहीं है। इतना ही नहीं,केंद्रीय गृह मंत्री ने पश्चिम बंगाल की जनता को आश्वस्त कर दिया था कि चुनाव परिमाणों की घोषणा के बाद भी केंद्रीय सुरक्षा बलों को एकदम वहां से नहीं हटाया जाएगा। गौर तलब है कि गत विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक वर्ग पर राज्य के उन क्षेत्रों में हिंसक गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप लगे थे जहां तृणमूल कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा था।इन चुनावों में भाजपा ममता बनर्जी की मुस्लिमतुष्टीकरण की नीति पर निशाना साधकर जिस तरह हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करने में सफल हुई उसने भी भाजपा की प्रचंड जीत का मार्ग प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करिश्माई लोकप्रियता, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रणनीतिक कौशल, पार्टी नेताओं और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम और राज्य में भय के माहौल की समाप्ति ने पश्चिम बंगाल में भाजपा के उस सुनहरे स्वप्न को साकार कर नया इतिहास रच दिया है जिसे कल तक नामुमकिन मानने वालों की कमी नहीं थी।आज घोषित चुनाव परिणामों ने उन्हें स्तब्ध कर दिया है।

(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

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