40 साल से कम उम्र के भारतीयों को बढ़ी दिल के दौरे की आशंका

नई दिल्ली। शायद यह भारत में दिल के रोगों के बढ़ते मामलों के संबंध में आंख खोलने वाला तथ्य हो। बहरहाल आंकड़ों से तो यही संकेत मिलता है कि करीब 50 फीसदी भारतीयों को 55 साल की उम्र से पहले ही दिल का दौरा पड़ता है। इसमें से करीब 25 फीसदी लोगों को 40 साल की उम्र से कम में दिल का दौरा पड़ता है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान में उन्नति होने के कारण जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लोग कम उम्र में ही दिल के दौरों का शिकार बनने लगे हैं।
दिल के दौरों का खतरा महिलाओं और पुरुषों को समान रूप से होता है। हालांकि लोगों में यह आम धारणा बन चुकी है कि पुरुषों को दिल का दौरा पड़ने की आशंका ज्यादा होती है, लेकिन महिलाओं को इस संबंध में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि उनमें दिल के दौरे के लक्षण स्पष्ट नहीं होते। जब कई लोग छाती में होने वाले दर्द को भ्रम के कारण गैस या अन्य समस्याओं से जोड़ते हैं तो स्थिति बहुत ज्यादा खतरनाक हो जाती है। इससे वह तत्काल चिकित्सीय सहायता की जरूरत से महरूम रह जाते हैं। लोगों के भ्रम के कारण ही रोग की पहचान होने में भी देर होती है।
साकेत में मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में कैथ लैब के निदेशक और वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ एवं सलाहकार डॉ. विवेका कुमार ने कहा, “दिल का दौरा उस समय पड़ता है, जब दिल तक रक्त पहुंचाने वाली रक्त की धमनियों में खून का थक्का जम जाता है। अव्यवस्थित और गतिहीन जीवन शैली और स्वास्थ्य को लिए हानिकारक भोजन कई बीमारियों, मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप को बुलावा देता है।“ दिल के दौरे के खतरे को बढ़ाने वाले कई कारक होते हैं। दिल के दौरे के लक्षणों की पहचान के संबंध में ज्ञान न होने से इनके कारण उत्पन्न होने वाली स्थिति को संभालने में देर लगती है। ये शरीर को होने वाले नुकसान को बढ़ा सकते हैं और कई मामलों में ये जानलेवा भी होते हैं। दिल के दौरों के लक्षणों की जल्दी पहचान कर तत्काल इसका इलाज कराना कई लोगों की जिंदगी को बचाने में मददगार हो सकता है। दिल के दौरों का खतरा टालने के लिए किसी और चीज की अपेक्षा जीवनशैली में कई बदलाव कर इससे काफी हद तक बचा जा सकता है।“
दिल के दौरे के समय मरीज को अपनी छाती के बीच बहुत तेज और बर्दाश्त न होने लायक दर्द होता है। यह दर्द शरीर के बाएं भाग की ओर फैलता है, खास तौर से इसमें बाएं हाथ में दर्द होता है। इसके बाद मरीज को पीछे की ओर दर्द महसूस होता है। यह ठोड़ी तक फैल जाता है और मरीज को जबड़ों में असुविधा महसूस होने लगती है। बेहताशा और असहनीय दर्द होने होने के कारण मरीज को बहुत ज्यादा पसीना निकलता है। इस स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में डायफोरेसिस कहा जाता है।

 

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