नई दिल्ली। प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तक सीमित नहीं रह गया है। पुणे स्थित MIT वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (MIT-WPU) में चल रहे एक डॉक्टोरल अध्ययन में शहर में आम तौर पर खाई जाने वाली मीठे पानी की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का पता चला है। शोध के शुरुआती निष्कर्षों ने मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के जरिए प्लास्टिक प्रदूषण के खाद्य श्रृंखला में प्रवेश को लेकर चिंता बढ़ाई है।
यह शोध MIT-WPU के पर्यावरण अध्ययन विभाग की पीएचडी शोधार्थी सिमरन सिंह द्वारा डॉ. सोमा मिश्रा के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। अध्ययन को MIT वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के सीड ग्रांट के तहत वित्तीय सहायता मिली है। शोध में विशेष रूप से बाजार में व्यापक रूप से उपलब्ध रोहू और तिलापिया जैसी मीठे पानी की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी, उसके स्वरूप, संभावित स्रोतों तथा मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है।
रोजाना 37-40 टन मछली पहुंचने का अनुमान
शोध की शुरुआत पुणे में मीठे पानी की मछलियों की आपूर्ति श्रृंखला की विस्तृत मैपिंग से की गई। शोधकर्ताओं ने केवल खुदरा बाजारों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय शहर में मछली की आपूर्ति के प्रमुख माध्यम थोक विक्रेताओं और वितरकों का सर्वेक्षण किया। अध्ययन के लिए पुणे को चार भौगोलिक क्षेत्रों में बांटकर प्रमुख वितरण नेटवर्क को शामिल किया गया।
शोधकर्ताओं ने पुणे में 26 थोक विक्रेताओं और वितरकों का साक्षात्कार लिया। सर्वेक्षण के आधार पर अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि पुणे के बाजार में प्रतिदिन लगभग 37 से 40 टन मीठे पानी की मछली पहुंचती है। इनमें रोहू और तिलापिया प्रमुख रूप से कारोबार की जाने वाली प्रजातियों में शामिल हैं।
मछली की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा एक्वाकल्चर प्रणालियों से आता है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, गुजरात, रत्नागिरी, मुंबई और कोलकाता समेत विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से भी मछलियां पुणे पहुंचती हैं। इससे शहर की मीठे पानी की मछली आपूर्ति श्रृंखला के व्यापक अंतरराज्यीय स्वरूप का पता चलता है।
मछलियों के नमूनों में मिले माइक्रोप्लास्टिक कण
प्रयोगशाला जांच में अध्ययन के लिए लिए गए मीठे पानी की मछलियों के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। इनमें फाइबर, टुकड़े (फ्रैगमेंट) और छोटे दाने/पेलेट शामिल थे। ये माइक्रोप्लास्टिक के वे सामान्य स्वरूप हैं, जो मीठे पानी के पर्यावरण में भी पाए जाते हैं।
शोध में पाए गए स्तर और स्थानीय मछली खपत के पैटर्न के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि यदि कोई व्यक्ति औसतन 250 ग्राम मीठे पानी की मछली सप्ताह में दो बार 50 वर्षों तक खाता है, तो वह संभावित रूप से 93,600 से 1,24,800 माइक्रोप्लास्टिक कणों के संपर्क में आ सकता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि कणों की संख्या की तुलना सीधे प्लास्टिक की बोतलों या अन्य प्लास्टिक वस्तुओं की संख्या से नहीं की जा सकती। माइक्रोप्लास्टिक के संभावित स्वास्थ्य प्रभाव और उसका कुल भार कई कारकों पर निर्भर करते हैं, जिनमें कणों का आकार, पॉलिमर की संरचना और उनसे जुड़े अन्य प्रदूषक शामिल हैं। इन पहलुओं का विस्तृत मात्रात्मक विश्लेषण और पॉलिमर की पहचान अभी शोध के अगले चरण में की जा रही है।
मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर आगे अध्ययन जरूरी
शोधकर्ताओं के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक विभिन्न रासायनिक और जैविक प्रदूषकों के वाहक के रूप में काम कर सकता है या उनके साथ प्रतिक्रिया कर सकता है। इनमें प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाले एडिटिव्स और आसपास के पर्यावरण में मौजूद प्रदूषक शामिल हो सकते हैं।
हालांकि, लंबे समय तक भोजन के जरिए माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आने से होने वाले संभावित प्रभावों को समझने के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों ने मीठे पानी से जुड़े खाद्य तंत्रों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की लगातार निगरानी और विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत पर जोर दिया है।
MIT-WPU की पीएचडी शोधार्थी सिमरन सिंह ने कहा कि माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को लेकर अधिकांश चर्चाएं समुद्री पर्यावरण पर केंद्रित रहती हैं, जबकि पुणे जैसे अंतर्देशीय शहरों और मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र पर अपेक्षाकृत कम अध्ययन हुआ है। उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य मछली के उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले उसकी पूरी यात्रा को समझना है। इसी कारण खुदरा बाजारों के बजाय थोक विक्रेताओं और वितरकों को अध्ययन का केंद्र बनाया गया।
राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में मिला तीसरा पुरस्कार
अध्ययन को National Scientist Round Table Conference (NSRTC) में भी पहचान मिली। सम्मेलन में सिमरन सिंह को उनके पोस्टर प्रेजेंटेशन के लिए तीसरा पुरस्कार प्रदान किया गया। यह सम्मेलन 17 से 19 जुलाई 2026 तक MIT-WPU, पुणे में आयोजित हुआ था।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सम्मान पर्यावरण प्रदूषण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सतत विकास के बीच संबंधों पर केंद्रित इस तरह के बहुविषयक शोध की प्रासंगिकता को दर्शाता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह खाद्य श्रृंखला से जुड़ी चिंता भी बनता जा रहा है। यह समझना जरूरी है कि माइक्रोप्लास्टिक कहां से आता है, मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में किस तरह आगे बढ़ता है और अंततः हमारे भोजन का हिस्सा बनने वाली मछलियों तक कैसे पहुंचता है।
MIT-WPU में अध्ययन के नमूनों का विस्तृत विश्लेषण अभी जारी है। शोध से पुणे और अन्य अंतर्देशीय मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्रों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े विकसित करने तथा जलीय स्वास्थ्य, खाद्य प्रणाली और मानव कल्याण पर इसके संभावित प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलने की उम्मीद है।

