अप्रैल 2022 के बाद पहली बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, 3 रुपये प्रति लीटर वृद्धि पर सियासत तेज

नई दिल्ली। करीब चार साल तक स्थिर रहने के बाद आखिरकार देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी गई है। अप्रैल 2022 के बाद पहली बार सीधे मई 2026 में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए गए हैं। तेल विपणन कंपनियों ने दोनों ईंधनों की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की है। इस फैसले के बाद जहां आम जनता पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलना शुरू कर दिया है।

हालांकि सरकार का कहना है कि वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल के कारण यह फैसला लेना मजबूरी बन गया था।

अप्रैल 2022 से स्थिर थीं कीमतें

भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल रहा है जहां पेट्रोल और डीजल की कीमतें अप्रैल 2022 से स्थिर बनी हुई थीं। हालांकि मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सरकार ने पेट्रोल और डीजल दोनों पर 2 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी, जिससे आम लोगों को राहत मिली थी।

इसके बाद लंबे समय तक कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया। जबकि इसी अवधि में पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। भारत के कई पड़ोसी देशों ने इस दौरान दो से तीन बार ईंधन की कीमतें बढ़ाईं, लेकिन भारत में अब जाकर सीमित बढ़ोतरी की गई है।

क्यों बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस मूल्य वृद्धि के पीछे दो प्रमुख कारण हैं—
पहला, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, और दूसरा, भारत के घरेलू रणनीतिक तेल भंडार में कमी।

सूत्रों के मुताबिक फरवरी 2026 से अब तक भारत का तेल भंडार करीब 15 प्रतिशत घटकर 107 मिलियन बैरल से 91 मिलियन बैरल के आसपास पहुंच गया है। इससे तेल कंपनियों और सरकार पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ था।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि तेल कंपनियां पिछले कई महीनों से घाटा सहकर कीमतों को स्थिर बनाए हुए थीं, लेकिन अब यह स्थिति लंबे समय तक बनाए रखना संभव नहीं था।

प्रधानमंत्री मोदी ने की ईंधन बचत की अपील

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन की बचत करने की अपील की है। प्रधानमंत्री ने लोगों से सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने, कार पूलिंग अपनाने, जहां संभव हो वहां वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और ऑनलाइन बैठकों को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। इसके साथ ही उन्होंने गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं और सोने की खरीद से बचने का आग्रह किया है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया जा सके। किसानों से भी रासायनिक उर्वरकों का सीमित उपयोग करने तथा सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई प्रणाली अपनाने की अपील की गई है।

तेल कंपनियों ने मांगी थी 16-17 रुपये की बढ़ोतरी

सूत्रों के मुताबिक सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 16 से 17 रुपये प्रति लीटर तक वृद्धि का प्रस्ताव रखा था। लेकिन सरकार ने आम जनता पर एकमुश्त बड़ा बोझ डालने की बजाय फिलहाल केवल 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। इसी वजह से अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले महीनों में ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो सरकार चरणबद्ध तरीके से और वृद्धि कर सकती है।

दिल्ली में पेट्रोल 97.77 रुपये प्रति लीटर

नई कीमतों के बाद राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 97.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल 90.67 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। देशभर में पेट्रोल, डीजल के साथ-साथ सीएनजी और एलएनजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम उपभोक्ताओं से लेकर उद्योग जगत तक चिंता बढ़ गई है।

पश्चिम एशिया संकट का असर

विशेषज्ञों के अनुसार इस मूल्य वृद्धि की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। फरवरी के अंत से अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट ने तेल आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कच्चे तेल परिवहन मार्गों में से एक है। संकट के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जबकि कुछ समय के लिए यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी चली गई।

भारत पर क्यों पड़ता है सीधा असर?

भारत अपनी कुल जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। खाड़ी देशों से तेल आपूर्ति में व्यवधान ने भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

तेल कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव

सरकारी तेल कंपनियां पिछले कई महीनों से अंतरराष्ट्रीय कीमतों का अतिरिक्त बोझ खुद उठा रही थीं ताकि उपभोक्ताओं पर अचानक असर न पड़े। लेकिन उद्योग जगत के अनुमानों के मुताबिक सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 10 अरब रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा था। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में स्वीकार किया था कि सरकारी रिफाइनरियों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा था कि तेल कंपनियां अनिश्चितकाल तक घाटा नहीं सह सकतीं।

महंगाई बढ़ने की आशंका

ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे महंगाई पर पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2026 में पेट्रोल महंगाई दर 32.4 प्रतिशत और हाई स्पीड डीजल महंगाई दर 25.19 प्रतिशत दर्ज की गई थी। वहीं खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल 2026 में बढ़कर 3.48 प्रतिशत हो गई, जो मार्च में 3.40 प्रतिशत थी। थोक मुद्रास्फीति 42 महीने के उच्च स्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं, कृषि उत्पादों और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा।

कांग्रेस ने साधा निशाना

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता था तब सरकार ने जनता को राहत देने की बजाय भारी कर वसूले। उन्होंने आरोप लगाया कि विधानसभा चुनाव खत्म होते ही पहले वाणिज्यिक एलपीजी और अब पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ा दी गईं। रमेश ने दावा किया कि इससे महंगाई बढ़ना तय है और आर्थिक विकास दर पर भी असर पड़ेगा।

आगे क्या?

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता।

फिलहाल 3 रुपये की यह बढ़ोतरी राहत और चिंता—दोनों का संकेत है। राहत इसलिए कि तेल कंपनियों की मांग के मुकाबले वृद्धि सीमित है, और चिंता इसलिए कि यह आगे आने वाले बड़े बदलावों की शुरुआत भी हो सकती है।

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