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जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन के आसार

बीजेपी ने पीडीपी से समर्थन वापस लिया, महबूबा ने कहा-किसी और के साथ नहीं बनाएंगे सरकार
आखिर 36 के आंकड़े में क्यों बदली 36 महीने की दोस्ती

नई दिल्ली/श्रीनगर। पीडीपी – भाजपा गठबंधन के टूटने के बाद जम्मू – कश्मीर में पिछले 40 साल में आठवीं बार राज्यपाल शासन लागू होने की संभावना प्रबल हो गयी है। अगर ऐसा होता है तो एन एन वोहरा के राज्यपाल रहते यह चौथा मौका होगा जब राज्य में केंद्र का शासन होगा। पूर्व नौकरशाह वोहरा 25 जून , 2008 को जम्मू – कश्मीर के राज्यपाल बने थे। पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में करीब तीन साल गठबंधन सरकार में रहने के बाद भाजपा ने सरकार से समर्थन वापसी की आज घोषणा की। भगवा पार्टी ने कहा कि राज्य में बढ़ते कट्टरपंथ और आतंकवाद के चलते सरकार में बने रहना मुश्किल हो गया था। विडंबना यह भी है कि निवर्तमान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के दिवंगत पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की उन राजनीतिक घटनाक्रमों में प्रमुख भूमिका थी , जिस कारण राज्य में सात बार राज्यपाल शासन लागू हुआ। पिछली बार मुफ्ती सईद के निधन के बाद आठ जनवरी , 2016 को जम्मू – कश्मीर में राज्यपाल का शासन लागू हुआ था। उस दौरान पीडीपी और भाजपा ने कुछ समय के लिए सरकार गठन को टालने का निर्णय किया था।
आखिरकार जम्मू कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी की दोस्ती टूट गई। विधानसभा चुनाव के बाद जब बीजेपी ने पीडीपी को समर्थन देकर सरकार में शामिल होने का फैसला लिया था तो हर कोई हैरान था। वजह साफ थी कि दोनों पार्टियों की विचारधारा एक दूसरे से रत्ती भर भी मेल नहीं खाती थी। पीडीपी पर जहां अलगाववादी समर्थक होने के आरोप थे वहीं बीजेपी पर मुस्लिम या कश्मीर विरोधी होने का लेवल चस्ंपा हुआ था, लेकिन इसके बावजूद जब दोनों ने सरकार बनाई तो निश्चित तौर पर यह उस वक्त का सबसे बड़ा अजूबा था। पहले ही दिन से लोग कहने शुरू हो गए थे कि यह सरकार लम्बी नहीं चलेगी। और आज वही हुआ। बीजेपी ने रमजान सीजफायर समाप्त होते ही पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया। इसके साथ ही महबूबा मुफ्ती सरकार का पतन हो गया और अब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन का रास्ता साफ है। फिलवक्त ऐसा कोई भी समीकरण सामने नहीं है कि फिर से वहां बिना चुनाव सरकार बने।
कश्मीर में महबूबा मुफ्ती सरकार से भाजपा के अलग होने के बाद कांग्रेस ने बुधवार को कहा कि उसका पीडीपी के साथ हाथ मिलाने का कोई सवाल ही नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने संवाददाताओं से कहा कि भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाकर बहुत बड़ी गलती की थी। उन्होंने कहा कि भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसे पीडीपी के साथ गठबंधन नहीं करना चाहिए था। आजाद ने कहा कि क्षेत्रीय पार्टियों को आपस में गठबंधन के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए था। कांग्रेस नेता ने कहा कि इस गठबंधन ने राज्य को आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह कर दिया और जम्मू – कश्मीर को बदहाली की स्थिति में छोड़ दिया। गौरतलब है कि भाजपा आज पीडीपी से अलग हो गई और उसने गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। पीडीपी से अलग होने के फैसला पर बोलते हुए बीजेपी महासचिव राम माधव ने बुधवार को कहा कि उनकी पार्टी जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन से बाहर हो गई है और राज्य में राज्यपाल शासन का समर्थन किया है।
इससे पूर्व माधव ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि राज्य में गठबंधन सरकार में बने रहना भाजपा के लिए मुनासिब नहीं रह गया था। उन्होंने कहा कि भाजपा ने राज्य में राज्यपाल शासन का समर्थन किया है। माधव ने पत्रकारों से कहा, जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, इस बात को ध्यान में रखते हुए और राज्य में मौजूदा स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए हमने फैसला किया कि राज्य में शासन की बागडोर राज्यपाल को सौंपी जाए। भाजपा नेता ने कहा कि राज्य में पीडीपी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही थी , लेकिन वह स्थिति को नियंत्रित करने में नाकाम रही।
बात अगर जम्मू कश्मीर की दलीय स्थिति की करें तो इस समय पीडीपी के 28 और बीजेपी के 25 विधायक हैं। नेशनल कांफ्रेंस के पास 15 और कांग्रेस के पास 12 विधायक हैं। समूचे विपक्ष को जोड़कर 34 एमएलए बनते हैं जबकि सत्ता पक्ष के पास 53 थे। कुल 87 सीटें हैं और दो महिलाएं नामित एमएलए हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 44 एमएलए चाहिए होते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर बीजेपी ने यह फैसला क्यों लिया? माना जा रहा है कि घाटी के हालात लगातार बिगड़ते देख बीजेपी ने यह फैसला लिया है। बीजेपी कश्मीर के हालात को लेकर विपक्ष के निशाने पर थी और देश के आम जनमानस में भी यह अवधारणा बन रही थी कि घाटी की हिंसा संभालने में बीजेपी कामयाब नहीं हो रही। दूसरी तरफ बीजेपी को भी लगने लगा था कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम के बाद घाटी के ताजा हालात उसके लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। यही वजह रही कि बीजेपी ने सरकार से किनाराकशी कर ली। सूत्रों की मानें तो रमजान सीजफायर की घोषणा के फैसले के दौरान ही यह फैसला ले लिया गया था कि अगर हालात नहीं सुधरे तो सरकार से बाहर का रास्ता अपना लिया जायेगा। रमजान के दौरान सेना की बंदूकें तो खामोश रहीं लेकिन आतंकियों को सर उठाने का मौका मिल गया। पूरे महीने में सौ से अधिक आतंकी हमले हुए जिनमे से 26 ग्रेनेड हमले भी थे। करीब 46 लोगों की इस दौरान मौत हुई, लेकिन मामला तब बिगड़ा जब ईद के दिन राइजिंग कश्मीर नामक अखबार के संपादक शुजात बुखारी की सरेआम हत्या कर दी गई। शुजात को भारत सरकार का समर्थक माना जाता है और वे केंद्र की राह कश्मीर में शांति बहाली के समर्थक थे। उनके सगे भाई महबूबा मंत्रिमंडल में मंत्री भी थे। शुजात की हत्या के लिए लश्कर को जिम्मेवार माना जा रहा है।

एक चर्चा यह भी

बीजेपी ने भले ही हिंसा को समर्थन वापसी का सबब बताया है लेकिन एक दूसरी चर्चा भी है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह बीजेपी का सोचा समझा मूव है। बीजेपी लोकसभा के साथ जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव कराना चाहती है। इसलिए उसने समय का ध्यान रखकर ही यह फैसला लिया। वैसे अब चर्चा यह भी चल निकली है कि ऐसा ही दांव बीजेपी मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी चल सकती है। वहां विधानसभाएं भंग कराकर इसे अंजाम दिया जा सकता है। बीजेपी के आंतरिक सर्वे के मुताबिक मोदी अभी भी लोकसभा के लिए टॉप चॉइस हैं। ऐसे में बीजेपी मोदी की किश्ती में कुछ राज्यों की सरकारें भी समेटकर ले जाने की फिराक में है।

सुभाष चन्द्र

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