सुप्रीम कोर्ट से JKM Infra को राहत, जांच की मांग वाली जनहित याचिका खारिज

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने JKM Infra Projects Limited से जुड़े कथित बैंकिंग धोखाधड़ी मामले की जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। 24 सितंबर को प्रतीक्षा एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कार्यवाही की प्रकृति और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री को देखते हुए वह इस जनहित याचिका पर विचार करने की इच्छुक नहीं है। इस फैसले से कंपनी को संबंधित न्यायिक कार्यवाही में राहत मिली है।

याचिका की स्वीकार्यता पर उठे थे सवाल

मामले में प्रतिवादी पक्ष ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि इसे प्रतिवादी संख्या 18 के इशारे पर अनुचित उद्देश्यों से दायर किया गया है। इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ताओं को अपनी पहचान, याचिका दायर करने के पीछे की मंशा और सूचना एवं दस्तावेजों के स्रोतों का खुलासा करने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ताओं के संयुक्त हलफनामे पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए इसे खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके इस फैसले से याचिकाकर्ताओं की bona fides यानी उनकी सद्भावना या मंशा पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं मानी जानी चाहिए।

SBI के ‘नो फ्रॉड’ फैसले का उल्लेख

याचिका खारिज होने से पहले भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने याचिका में उठाए गए प्रमुख मुद्दों पर अपना पक्ष रखा था।

SBI के जवाबी हलफनामे के अनुसार, बैंक की फ्रॉड आइडेंटिफिकेशन कमेटी ने JKM के खाते को ‘नो फ्रॉड’ श्रेणी में रखने का निर्णय लिया था। बैंक ने बताया कि Ernst & Young की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट निर्णायक नहीं थी और बाद में AKG & Associates ने भी इसकी समीक्षा की थी।

बैंक के इस रुख को JKM Infra के बचाव में एक महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, यह बैंक की ओर से प्रस्तुत पक्ष है और इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा कथित धोखाधड़ी के सभी आरोपों पर दिए गए अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

SBI ने वित्तीय संकट और कर्ज वसूली प्रक्रिया का दिया ब्योरा

SBI के अनुसार, वित्त वर्ष 2015 तक कंपनी का खाता संतोषजनक था। इसके बाद भूमि आवंटन में देरी, वैधानिक मंजूरियां मिलने में बाधाएं और बकाया राशि की वसूली में कठिनाइयों के कारण कंपनी के परिचालन पर असर पड़ा।

बैंक ने Prudent ARC को 120 करोड़ रुपये में कर्ज हस्तांतरित करने के फैसले का भी बचाव किया। SBI के मुताबिक, उस समय खाते में बहीखाता बकाया राशि 427.43 करोड़ रुपये थी।

बैंक ने कहा कि यह लेनदेन वसूली के प्रयासों और Swiss Challenge प्रक्रिया के बाद किया गया था। इसके अलावा, सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बाहरी स्क्रीनिंग समिति (External Screening Committee) ने भी इसकी जांच की थी। इसके बाद वरिष्ठ ऋण समितियों और बोर्ड स्तर की समितियों के माध्यम से प्रक्रिया की समीक्षा की गई।

RBI ने शिकायत में हस्तक्षेप योग्य उल्लंघन नहीं पाया

RBI ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत की जांच में ऐसा कोई नियामकीय उल्लंघन सामने नहीं आया, जिसके आधार पर हस्तक्षेप करना आवश्यक हो।

RBI के अनुसार, लागू नियमों और सुरक्षा उपायों के अधीन कर्ज अधिग्रहण की कीमत तथा समझौता निपटान जैसे निर्णय बैंकों और एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARCs) के व्यावसायिक विवेक के दायरे में आते हैं।

याचिका खारिज, जांच के निर्देश नहीं

24 सितंबर के आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं की मांग के अनुरूप जांच का कोई निर्देश नहीं दिया। इस आदेश से संबंधित PIL की कार्यवाही समाप्त हो गई है।

SBI द्वारा खाते को ‘नो फ्रॉड’ मानने के फैसले और RBI की नियामकीय प्रतिक्रिया से JKM Infra के पक्ष को समर्थन मिलता है। हालांकि, उपलब्ध आदेश के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अदालत ने सभी आरोपों को गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया है या वैधानिक जांच एजेंसियों के अधिकार समाप्त कर दिए हैं।

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