प्रकृति में स्वयं को सुधारने की अद्भुत क्षमता : सदगुरु

ईशा फाउंडेशन के प्रमुख और आध्यात्मिक गुरु सदगुरु जग्गी वासुदेव का कहना है कि सब कुछ पा लेने की मनुष्य की महत्वाकांक्षाा ने धरती के अस्तित्व को ही खतरे में टाल दिया है। हमें लेने के साथ देने की प्रवृति भी सीखनी चाहिए। पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश:

पूरे देश में कोलाहाल है ?
भारत में शोर है। हर व्यक्ति को हर कार्य करने की आजादी है, लेकिन स्वभाव से हर व्यक्ति शांत प्रकृति का है। यही भारत की पहचान और क्षमता है। शांति एक आधारभूत आवश्यकता है। अवधारणाएँ बहुत है लेकिन उन्हें जीवंत करने के सटीक उपकरण उपलब्ध नहीं होते। यदि उपकरण हैं तो उन्हें उपयोग करने का विवेक नहीं होता। भारतीय जीवन मूल्य पद्धति में उपकरणों का सही उपयोग बताया गया है। बुद्धि को उपयोग करने का विवेक भारतीय मूल्यों और योगिक विज्ञान में ही मिलता है।
अब से 25 साल बाद भारत सर्वाधिक मूल्यवान देश के रूप में पहचाना जायेगा। सिर्फ भारत ही दुनिया में उभरी आंतरिक समस्याओं का समाधान दे पायेगा। अब लोगों ने अपने से ऊपर देखने के बजाय बाहर देखना शुरू कर दिया है। वे अपने बारे में सोचने में सक्षम हो गये हैं। भारत अब चेतना से संबंधित विकारों का समाधान करने में सक्षम है।

अधिसंख्य लोगों का कहना है योग भारत का पूरे विश्व को अनुपम उपहार है ?
योग न तो भारतीय है और न ही भारत का है। ऐसा इसलिए कि मानव कल्याण के लिए योग एक निरपेक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी है। विज्ञान अपनी सर्वव्यापकता और निरपेक्षता के कारण योग भारतीय नहीं हो सकता है। हां, इसकी उत्पत्ति भारत में हुई है। भारतीय होने के नाते इसके लिए मुझको गर्व है। लेकिन यह यह भारत से संबंधित नहीं है। यह सत्य है कि संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा की है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ने इसे दुनिया को उपहार के रूप में दिया है।

हिंदू धर्म को लेकर समय-समय पर कई तरह की बातें होती हैं। आपकी नजर में हिंदू कौन है ?
हिंदू कोई धर्म नहीं है, क्योंकि इससे जुड़ी कोई किताब या फिर धर्मगुरु मौजूद नहीं है।यह एक भौगोलिक पहचान है और इस धरती पर पैदा हुए किसी भी शख्स को हिंदू कहा जा सकता है। मेरे अनुसार, उन्हें धार्मिक मान्यताओं के आधार पर चुना जाना गलत है।

बुद्ध ने कहा इच्छा न करो। लेकिन आप तो कहते हैं-सारा कुछ पाने की इच्छा करो। यह विरोधाभास क्यों है?
जो अपने जीवन-काल के अंदर समस्त मानव-जाति को ज्ञान प्रदान करने की इच्छा करते रहे, क्या उन्होंने लोगों को इच्छा का त्याग करने को कहा होगा? कभी नहीं। बड़ी से बड़ी इच्छाएँ पालिए। उन्हें पाने के लिए सौ फीसदी लगन के साथ कार्य कीजिए। ध्यानपूर्वक इच्छा का निर्वाह करेंगे तो वांछित मनोरथ पा सकते हैं। सब कुछ पा लेने की मनुष्य की महत्वाकांक्षाा ने धरती के अस्तित्व को ही खतरे में टाल दिया है। हमें लेने के साथ देने की प्रवृति भी सीखनी चाहिए।

 

 

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