नई दिल्ली।विश्व पुस्तक मेले का अंतिम दिन, रविवार, ऐसा लगा जैसे पूरा मेला परिसर लोगों की भीड़ से गुलजार हो गया हो। सुबह-सुबह से ही प्रवेश द्वार से लेकर हर हॉल तक एक सतत बहती भीड़। आज पुस्तक मेला में कदम आगे बढ़ाना आसान नहीं था। लेकिन चेहरों पर थकान के बजाय उत्साह और किताबों के प्रति जोश नजर आ रहा था। कई लोग मुस्कराते हुए कह रहे थे, “पैर तो दुख गए चलते-चलते, लेकिन किताबों के बीच मन नहीं भरा। यह थकान भी सुखद है।”
इस दिन का विशेष आकर्षण था परिवारों की भारी उपस्थिति। माता-पिता, दादा-दादी, बच्चे और किशोर—हर पीढ़ी की मौजूदगी ने मेले को सचमुच एक उत्सव का रूप दे दिया। कहीं कोई पिता अपने बच्चे को मनपसंद कॉमिक किताब दे रहे थे, तो कहीं मां-बेटी साहित्यिक किताबों के स्टॉल पर चर्चा में मशगूल थीं। हर आयु वर्ग के लोगों की अलग-अलग पसंद और उत्साह ने मेले को एक जीवंत रंग दिया।
सबसे अधिक ध्यान बच्चों की चहल-पहल ने खींचा। रंग-बिरंगी किताबें, चित्र कथाएं और बाल साहित्य के स्टॉल्स पर बच्चों की चहलकदमी उम्मीद जगाने वाली थी। डिजिटल युग के बावजूद बच्चों में किताबों के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ। उनकी आंखों में किताबें चुनने की खुशी, नई कहानियों की खोज और सवालों की चमक इस बात का संकेत दे रही थी कि ये बच्चे आने वाले समय के उत्साही पाठक बनेंगे।
युवाओं में भी खासा उत्साह देखा गया। कई युवा पाठक पब्लिशर्स के विशेष डिस्काउंट ऑफर्स का पूरा लाभ उठाते नजर आए। किसी के हाथ में प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें थीं तो कोई उपन्यासों और नॉन-फिक्शन की गठरी संभाले हुए था। “आज नहीं खरीदीं तो फिर मौका नहीं मिलेगा”, यह सोच हर दूसरे युवा के चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी।
दिन ढलते-ढलते थकान बढ़ गई, लेकिन कदम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। हजारों लोगों की यह भीड़ केवल एक संख्या नहीं थी, यह पढ़ने की आदत, जिज्ञासा और ज्ञान की तलाश का जीवंत प्रमाण थी। हर स्टॉल पर सवालों की गूंज, किताबों के पन्नों को पलटते हाथ और किताबों की खुशबू में डूबे लोग इस बात की गवाही दे रहे थे कि मेले का असली मकसद केवल खरीद-फरोख्त नहीं, बल्कि पढ़ने, सीखने और अनुभव साझा करने का उत्सव है।

