बीते दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को लगे पंख 

मुम्बई। इंफ्रास्ट्रक्चर का क्षेत्र, जो कि भारतीय बाजार की संचालक शक्ति है, इसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। फलस्वरूप, भारत सरकार इस उद्योग की प्रगति सुनिश्चित करने के लिए इसपर विशेष जोर देती है व कई विनियामक संरचनाओं की शुरूआत और स्थापना करती है। इस पृष्ठभूमि के साथ, फेडरेशन आॅफ इंडियन चेंबर्स आॅफ कॉमर्स (एफआईसीसीआई) की साझेदारी व नॉलेज पार्टनर के रूप में विकासशील देशों के लिए अनुसंधान और सूचना प्रणाली (आरआईएस) के सहयोग से भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट फंडिंग के गंभीर आयामों का समाधान करना और निजी क्षेत्र के धुरंधरों से वित्तीय सहायता की आवश्यकता को रेखांकित करना है।
उद्घाटन सत्र के दौरान, कई महत्वपूर्ण हस्तियों, जैसे कि श्री सुजॉय बोस, सीईओ, नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फण्ड, श्री शैलेश पाठक, सीईओ, एलएंडटी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवेलपमेंट प्रोजेक्ट्स लिमिटेड एवं डॉ. कुमार वी. प्रताप, जॉइंट सेक्रेटरी, (आईपीएफ), वित्त मंत्रालय, भारत सरकार, ने  इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश परिदृश्य पर अपने विशेषज्ञतापूर्ण दृष्टिकोण साझा किए।
इस अवसर पर बोलते हुए डॉ. कुमार वी. प्रताप ने कह कि बेहद तेजी से विकास करते हुए, भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को 2007 से 2017 की अवधि में 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश मिला है, जिसमें से एक तिहाई से अधिक की पूंजी का योगदान निजी क्षेत्र द्वारा दिया गया था। भारत का लक्ष्य 200 अरब डॉलर सालाना निवेश करना है; (हालांकि अभी तक) केवल 110 बिलियन डॉलर का निवेश करने में सक्षम रहा है। निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए, भारत सरकार ने कई पहल शुरू की है। ब्राउनफील्ड एसेट मोबिलिजेशन फॉर इंफ्रा इंवेस्टमेंट्स (बीएएमआईआई) जैसी योजनाएं, इंफ्रा कंपनियों द्वारा जारी बॉन्ड रेटिंग बढ़ाने और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए नए क्रेडिट रेटिंग स्केल के लिए क्रेडिट एन्हांसमेंट फंड निजी निवेशकों के लिए अवसर पैदा करते हैं, जिससे इस क्षेत्र में वित्तीय संसाधनों का एक स्थिर प्रवाह बढ़ता है।
इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री सुजॉय बोस ने कहा कि एक विकासशील अर्थव्यवस्था, सरकारी  इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के प्रवाह में वृद्धि के साथ भारत निवेश के लिए एक पसंदीदा गंतव्यस्थल है। भारत सरकार ने फंडिंग क्षेत्र में अंतर को खत्म करने में लगे इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में वित्तीय निवेश सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (एनआईआईएफ), इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट ट्रस्ट (आईएनआईटी) और बिल्ड आॅपरेट एंड ट्रांसफर (बीओटी) के तहत विभिन्न परियोजनाओं को वित्त-संपोषण किया है।
इससे पहले श्री जसपाल बिंद्रा, फिक्की के अध्यक्ष, महाराष्ट्र राज्य परिषद और कार्यकारी अध्यक्ष, सेंट्रम समूह ने इस पैनल का स्वागत किया और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निजी फायनेंसिंग से संबंधित अवसरों के बारे में बात की। उन्होंने कहा, “वैश्विक आबादी में 2040 तक लगभग 2 बिलियन लोगों की वृद्धि होगी। ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर हब की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में 97 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत है, जिसमें से 50% आवश्यकता एशिया की है। 2040 तक भारत को इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में करीब 4.5 ट्रिलियन निवेश की जरूरत है। श्री सुभोम भट्टाचार्य, सलाहकार, आरआईएस ने 21 वीं शताब्दी में आधारभूत संरचना की परिभाषा में प्रतिमान परिवर्तन का विश्लेषण किया और सरकारी परियोजनाओं के अंतर्गत संसाधनों के संगठनीकरण में निजी क्षेत्र की भागीदारी और नवीनीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इसके बाद सत्र के लिए ढांचा तैयार करने के लिए उन्होंने इस सेगमेंट में निवेश करते समय वर्तमान इंफ्रास्ट्रक्चर परिदृश्य और वित्तीय, संस्थागत और नियामक संचालन को समझने के महत्व को बताया।
जोखिम प्रबंधन पर सत्र की अध्यक्षता श्री साजिद जेड चिनॉय, जेपी मॉर्गन के प्रमुख भारतीय अर्थशास्त्री, श्री सुदीप सुरल, वरिष्ठ निदेशक, इन्फ्रा और पब्लिक फाइनेंस, क्रिसिल इंफ्रास्ट्रक्चर सलाहकार, श्री प्रवीण गुप्ता, प्रबंध निदेशक और चीफ कार्यकारी अधिकारी, रहेजा क्यूबीई जनरल इंश्योरेंस, श्री सुनीत माहेश्वरी, संस्थापक और प्रबंध भागीदार, उद्विक इंफ्रास्ट्रक्चर सलाहकार, श्री राघवेन्द्र पांडे, हेड इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट सेक्टर, निवेश बैंकिंग, आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज लिमिटेड और श्री सौम्यजीत नियोगी, एसोसिएट डायरेक्टर, भारत रेटिंग जैसे प्रमुख और प्रतिष्ठित पैनलिस्टों ने की। उन्होंने किसी परियोजना के शुरू होने के बाद नजर आने वाले विभिन्न जोखिमों पर विचार-विमर्श किया, जैसे कि नियामक जोखिम, राजनीतिक जोखिम, बाजार जोखिम, प्रायोजित जोखिम, न्यायिक जोखिम इत्यादि। जोखिम उन भुगतानों को निर्धारित करते हैं जो निजी कंपनियां किसी भी परियोजना को अनुबंधित करने से पहले तय कर लेना चाहती हैं। अनुबंध को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए।

सुभाष चन्द्र

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