जैन तीर्थों के दर्शन के लिए राजस्थान पहुंचे 28.79 लाख घरेलू पर्यटक

 

सोनल जैन

राजस्थान के जैन तीर्थों में दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। प्रदेश के 14 प्रमुख जैन मंदिरों और तीर्थस्थलों पर जनवरी से जून 2026 के दौरान 28,79,241 घरेलू पर्यटक दर्ज किए गए। राजस्थान पर्यटन विभाग की गंतव्यवार गणना में माउंट आबू स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर सबसे आगे रहा। यहां छह माह में 11.44 लाख से अधिक घरेलू पर्यटक पहुंचे। बालोतरा के नाकोड़ा जैन तीर्थ में 4.86 लाख और सवाई माधोपुर के आलनपुर स्थित चमत्कार जैन तीर्थ में 2.66 लाख घरेलू पर्यटकों की उपस्थिति दर्ज हुई।
ये आंकड़े राजस्थान की जैन धार्मिक विरासत के पर्यटन महत्व को सामने रखते हैं। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित ये तीर्थ अपनी धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन प्रतिमाओं, मंदिर स्थापत्य और तीर्थयात्रा की परंपराओं के लिए पहचाने जाते हैं। दिलवाड़ा और रणकपुर जैसे मंदिर जहां संगमरमर की बेजोड़ शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं नाकोड़ा, पावापुरी और जिरावला जैसे तीर्थ श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े प्रमुख केंद्र हैं।

दिलवाड़ा, नाकोड़ा और रणकपुर बने धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र

प्राचीन मंदिरों की शिल्पकला और सदियों पुरानी तीर्थ परंपराएं भी खींचती हैं श्रद्धालुओं को

सिरोही जिले के माउंट आबू स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिरों में जनवरी-जून 2026 के दौरान 11,44,172 घरेलू पर्यटक दर्ज किए गए। संगमरमर पर बारीक नक्काशी, कलात्मक स्तंभ और अलंकृत छतें इन मंदिरों की विशिष्ट पहचान हैं। विमल वसाही और लूण वसाही मंदिर मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
बालोतरा के नाकोड़ा जैन तीर्थ में इसी अवधि में 4,86,500 घरेलू पर्यटक पहुंचे। पश्चिमी राजस्थान में स्थित यह तीर्थ जैन श्रद्धालुओं के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में शामिल है। पाली जिले के रणकपुर जैन मंदिर में 1,71,527 घरेलू पर्यटक दर्ज किए गए। आदिनाथ को समर्पित इस मंदिर की विशाल संरचना और संगमरमर के स्तंभ इसकी स्थापत्य विशेषताओं को विशिष्ट बनाते हैं।
सिरोही जिले के पावापुरी मंदिर में 2,58,788 और जिरावला जैन मंदिर में 1,92,310 घरेलू पर्यटकों की उपस्थिति दर्ज हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में जैन तीर्थों का धार्मिक पर्यटन कई जिलों में फैला हुआ है।
आस्था के साथ इतिहास और स्थापत्य का आकर्षण
राजस्थान के जैन मंदिरों की पहचान केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। इनकी निर्माण परंपराएं, मूर्तिकला, शिलालेख और धार्मिक साहित्य प्रदेश के इतिहास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। प्राचीन जैन ग्रंथों में तीर्थयात्राओं, आचार्य परंपराओं और धार्मिक केंद्रों से संबंधित विवरण मिलते हैं। इनका अध्ययन मंदिरों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने में मदद करता है।
अजमेर की सोनीजी की नसियां, बीकानेर का भांडाशाह जैन मंदिर, खैरथल-तिजारा का तिजारा जैन मंदिर और बांसवाड़ा का आंदेश्वर जैन तीर्थ भी इस विरासत के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। झालावाड़ जिले के चांदखेड़ी और उन्हेल स्थित तीर्थ तथा भीलवाड़ा के जहाजपुर जैन मंदिर भी घरेलू पर्यटकों की सूची में शामिल हैं।
उदयपुर जिले का ऋषभदेव तीर्थ भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन स्थलों की विशेषता यह है कि प्रत्येक क्षेत्र में जैन धार्मिक परंपराओं के साथ स्थानीय इतिहास और स्थापत्य की अलग-अलग छवियां देखने को मिलती हैं।

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