राम जन्मभूमि से बहुजन गायब

डा.उदित राज
बाबरी मस्जिद का विवाद दशकों से रहा है। सन् 1991 में कार सेवकों ने इसे ध्वस्त कर दिया। उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार आदि पिछड़े वर्ग के नेता एवं जातियां अग्रगणीय भूमिका में रहीं। वीपी सिंह जी की सरकार ने मंडल कमीशन की जब सिफारिश लागू करने की घोषणा की तो आरएसएस एवं भाजपा ने पूरे देश स्तर पर जोरदार विरोध किया। इनका कहना था कि शिक्षा में भागीदारी देकर पिछड़ों को आगे लाना चाहिए था। जो पिछड़े आरक्षण के जरिए सरकारी नौकरियों में आएंगे, उससे दक्षता पर असर पड़ेगा। 2006 में जब यूपीए की सरकार ने पिछड़ों को उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया तब भी विरोध आरएसएस और भाजपा की ओर से हुआ कि इससे जो पिछड़े डाक्टर, इंजीनियर बनेंगे उनकी मैरिट नहीं होगी। मंडल के विरूद्व पूरे देश में लालकृष्ण आडवाणी रथ लेकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर निकले। दरअसल, मंडल के विरूद्व जो आक्रोश था उसका बड़ी चतुराई से दिशा मोड़ दिया। वह अलग बात है कि पिछड़े ही कमंडल के तारणहार बने।
5 अगस्त 2020 को श्री नरेंद्र मोदी एवं श्री मोहन भागवत के द्वारा रामजन्म भूमि का पूजन किया गया। कार्यक्रम बहुत भव्य रहा। पूरे देश की मीडिया अपने.अपने तरह से समाचार प्रसारण कर रही थी कि ऐसा मंजर कभी देखने को न मिला होगा। प्रधानमंत्री के संबोधन से लगा कि देश रामराज्य की तरफ अब बढ़ेगा। सभी संबोधनकर्ताओं ने कहा कि असीम आनंद का क्षण है, जैसे कि भारत का पुनः उदय हो रहा है। उमा भारती, कल्याण सिंह और विनय कटियार जिन्होंने पूरा आंदोलन का नेतृत्व किया था, उनको आमंत्रित नहीं किया गया। राम मंदिर बनाने का नेतृत्व करने वाले लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी भी गायब थे। उमा भारती ने अपने दर्द को बयां ही कर दिया कि अयोध्या बीजेपी की बपौती नहीं है। हिंदुत्व के बड़े नेता सुब्रहमण्यम स्वामी ने भी कहा कि मोदी जी का राम मंदिर निर्माण में कोई योगदान नहीं।
राम जन्मभूमि पूजन से जो वक्तव्य दिए गए और मीडिया ने बार.बार कहा कि भगवान राम सबके हैं। यहां पर विचारणीय बात यह है, अगर राम सबके हैं तो राहुल गांधी, प्रियंका गांधीए अखिलेश यादव एवं कल्याण सिंह को आमंत्रित करना चाहिए था। यह कहने का प्रयास किया जाएगा कि कर्ताधर्ता तो राम जन्मभूमि ट्रस्ठ है, जो कि है नहीं। राम जन्मभूमि ट्रस्ट को भी तो सरकार ने ही बनाया। कुल मिलाकर सारी बागडोर आरएसएस और भाजपा के हाथ रही है और आगे रखने का पूरा प्रयास करेंगे तथा साधु—संत तो मोहरे हैं। बीजेपी की आईटी सेल और मीडिया के द्वारा प्रचारित करना कि जो कल रात राम विरोधी थे आज सब राम भक्त हो गए। जैसे कि राम भक्ति की रजिस्ट्री इन्हीं के लोगों के नाम तय हो गई। धर्म निहायत निजी मामला है और मान्यता के हिसाब से भगवान कण—कण में हैं। जब कण—कण में हैं तब यह कहना कि भगवान राम का घर नहीं था, अब घर बन जाएगा या एक ही जगह पर निवास निश्चित कर देना, क्या भगवान राम की गरिमा और शक्ति को चुनौती देना नहीं हुआ, बार—बार यह कहना कि कांग्रेस भी राम भक्त हो गई है। इसका मतलब भाजपा राम के ठेकेदार हो गई हैं। कांग्रेस में हर विचारधारा के लोग हैं और जो हिंदु धर्म को मानते हैं वो वोट के नुमाइश नहीं लगाते बल्कि संविधान सम्मत बातें करते हैं।
शायद मोदी जी की सरकार एक भी वायदा चाहे 15 लाख खाते में डालना, काला धन वापिस लाना, प्रतिवर्श दो करोड़ रोजगार देना, डीजल—पेट्रोल के दाम कम करना, डाॅलर के मुकाबले रूपए को मजबूत करनाए किसानों की आय दुगुना करना, सबको घर देना, निजीकरण न करना आदि को पूरा किया हो। लेकिन एक काम जरूर किया कि राम जन्मभूमि के मुददे को जिंदा रखना और भूमि पूजन। इसके विपरित कांग्रेस ने रोजी—रोटी, भागीदारी, आर्थिक विकास के कार्य को किया और धर्म की नुमाइश नहीं किया। धार्मिक होना बेहद निजी कार्य है और जनतंत्र में सरकार के लिए सभी धर्म बराबर है। राम जन्मभूमि का पूजन का कार्यक्रम साधु—संत करे तो वो धार्मिक है लेकिन देश का प्रधानमंत्री न केवल उदघाटन करे बल्कि सारा कार्यक्रम सत्ता के संरक्षण में होए यह संविधान के दर्शन के विपरित है। जिस तरह से कुछ इस्लामिक देश में धर्म तंत्र का राज आ गया हैए उसी तर्ज पर भारत भी निकल पड़ा है।
धर्म पर चर्चा करना बहुत मुश्किल है और लोगों की आस्था को तुरंत ठेस पहुंच जाता है। न भी आस्था हो तो भी लाभ के लिए आस्था का सवाल बना लेते हैं। बीजेपी को सत्ता में लाने का सबसे ज्यादा कोई कारण है तो राम जन्मभूमि। 2023 में मंदिर निर्माण पूरा होगा और 2024 में वोट की खेती लहलहा पड़ेगी। इन परिस्थितियों में विपक्ष बहुत कमजोर हो सकता है और रोजगार, शिक्षा, महंगाई, अर्थव्यवस्था, किसान की समस्या आदि पर बात करना मूर्खता लगने लगेगी। जब राज्य का अपना धर्म हो जाता है और जनता अंधविश्वासी हो जाती है तो उसे अभाव की जिंदगी जीना भी स्वर्ग लगने लगता है। एक बात जो आज हुई है कि बहुजन की आवाज और समस्या गायब हो गई है। न तो ट्रस्ट में और न ही आमंत्रित लोगों में बहुजन समाज के लोग थे। ऐसा लगता है, यह उसी दृश्य को दर्शाता है कि जब राम वनवास में गए तो आदिवासी पिछड़े उनका सिपहसलाहकार होकर लड़े और कुबार्नी दिया। राम जब वनवास से लौटकर आते हैं तो अयोध्या में दीवाली मनती है और सिपहसलाहकार की उपस्थिति नहीं होती और दीवाली मनती है तो उस अवसर पर सिपहसलाकार गायब रहते हैं। आज के दृष्य में भी वही हुआ कि लोध, कुर्मी, पाल, गडरिया, अहीर, जाट, पासी, खटीक, चमार, बाल्मिकी गायब दिखे। अगर सभी समाज को भागीदारी दी गई होती तो उससे हिंदु धर्म ही मजबूत होता। आरएसएस उस चिंता से मुक्त हो जाता कि लोग मुस्लिमए इसाई और बौद्ध बन रहे हैं। डाॅ. आंबेडकर ने कहा था कि हिंदु धर्म एक ऐसी योजना है, जिसके माध्यम से मुट्ठी भर लोग बहुजन पर राज करे।
(लेखक डॉ उदित राज  परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, पूर्व लोकसभा सदस्य और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

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