लोकसभा में हुआ सिर्फ 19% काम, लेकिन यह सबसे खराब प्रदर्शन नहीं; 2010 में महज 5% चली थी कार्यवाही

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र हंगामे, विरोध-प्रदर्शन और सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बीच समाप्त हो गया। सत्र के समापन के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने मीडिया को बताया कि इस दौरान लोकसभा में निर्धारित समय का केवल 19 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा में 39 प्रतिशत कामकाज हुआ। उन्होंने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार सदन चलाना चाहती थी, लेकिन विपक्ष लगातार व्यवधान पैदा करता रहा।

हालांकि, लोकसभा की इस सत्र में उत्पादकता बेहद कम रही, लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इसे संसद के इतिहास का सबसे कम कामकाजी सत्र नहीं कहा जा सकता। 2009 के बाद के संसदीय सत्रों के आंकड़ों में कई ऐसे उदाहरण हैं, जब लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता मौजूदा मानसून सत्र से भी कम रही है।

2010 में लोकसभा की उत्पादकता सिर्फ 5%

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2010 का शीतकालीन सत्र संसद के सबसे खराब प्रदर्शन वाले सत्रों में शामिल रहा। उस दौरान 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जबरदस्त गतिरोध था।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2010 के शीतकालीन सत्र में लोकसभा निर्धारित समय का केवल 5 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा महज 2 प्रतिशत समय ही काम कर सकी थी।

2जी विवाद के चलते ठप रहा सदन

2010 का शीतकालीन सत्र लगभग पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया था। विपक्ष 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित करने की मांग कर रहा था।

वहीं, तत्कालीन सरकार का कहना था कि मामले की जांच लोक लेखा समिति (PAC) के माध्यम से भी हो सकती है। दोनों पक्षों के बीच गतिरोध दूर नहीं हो सका और संसद के कामकाज का अधिकांश समय हंगामे में गुजर गया।

2013 में भी सिर्फ 6% चली लोकसभा

इसके बाद 2013 का शीतकालीन सत्र भी भारी हंगामे और राजनीतिक गतिरोध से प्रभावित रहा। विपक्ष ने दूरसंचार लाइसेंस आवंटन से संबंधित JPC के निष्कर्षों को लेकर तत्कालीन सरकार को घेरा।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश के सांसदों ने तेलंगाना गठन के मुद्दे पर विरोध किया। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद विस्थापित लोगों की स्थिति को लेकर भी सदन में हंगामा हुआ।

इस सत्र में लोकसभा निर्धारित समय का केवल 6 प्रतिशत ही काम कर सकी थी।

मोदी सरकार में भी कई बार बाधित हुआ कामकाज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में भी संसद के कई सत्र हंगामे और विरोध के कारण प्रभावित हुए हैं।

2015 के मानसून सत्र में लोकसभा की उत्पादकता 46 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा की उत्पादकता केवल 9 प्रतिशत रही थी। उस समय विपक्ष ने तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से जुड़े ललित मोदी विवाद और मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले को लेकर सरकार को घेरा था।

सत्र के दौरान कांग्रेस के 44 में से 25 सांसदों को पांच दिनों के लिए निलंबित भी किया गया था। इसके विरोध में कई विपक्षी दलों ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया था।

नोटबंदी के विरोध में 2016 का सत्र भी प्रभावित

इसके अगले वर्ष 2016 के शीतकालीन सत्र में नोटबंदी के मुद्दे पर विपक्ष के विरोध के कारण संसद की कार्यवाही बुरी तरह प्रभावित हुई।

इस दौरान लोकसभा निर्धारित समय का केवल 15 प्रतिशत, जबकि राज्यसभा 18 प्रतिशत ही काम कर सकी। इसे एनडीए सरकार के कार्यकाल में लोकसभा के सबसे कम उत्पादक सत्रों में से एक माना जाता है।

मौजूदा सत्र पर फिर उठे सवाल

मौजूदा मानसून सत्र में लोकसभा की 19 प्रतिशत उत्पादकता निश्चित रूप से चिंता का विषय है। संसद कानून बनाने, नीतियों पर चर्चा करने और सरकार को जवाबदेह बनाने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। ऐसे में लगातार व्यवधान से न केवल संसदीय समय का नुकसान होता है, बल्कि महत्वपूर्ण विधायी और जनहित के मुद्दों पर सार्थक बहस भी प्रभावित होती है।

हालांकि, पिछले वर्षों के आंकड़े यह भी बताते हैं कि संसद में कामकाज का बाधित होना कोई नई घटना नहीं है। अलग-अलग दौर में राजनीतिक विवादों और महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर सदन की कार्यवाही प्रभावित होती रही है। इसलिए मौजूदा सत्र की कम उत्पादकता पर बहस के साथ-साथ संसदीय कार्यवाही को अधिक सुचारु, जवाबदेह और प्रभावी बनाने के स्थायी उपायों पर भी गंभीर चर्चा जरूरी है।

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