कृष्णमोहन झा
हाल में ही देश के तीन राज्यों मध्यप्रदेश, गुजरात एवं बिहार की एक एक विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा को केवल एक सीट से ही संतोष करना पड़ा। गुजरात की इस मांजलपुर विधानसभा सीट पर उसकी जीत पहले से ही तय मानी जा रही थी। मध्यप्रदेश की दतिया और बिहार की बांकीपुर सीट के लिए हुए उपचुनाव में भी भाजपा को अपनी जीत का पूरा भरोसा था परन्तु इन दोनों ही सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा।दतिया की सीट तो भाजपा के पास पहले भी नहीं थी इसलिए दतिया उपचुनाव में अपनी हार से वह शायद उतनी गमगीन नहीं है,लेकिन बिहार के बांकीपुर में मिली अप्रत्याशित पराजय ने उसे स्तब्ध कर दिया है।पिछले तीस साल से भाजपा के कब्जे में रही उसकी इस सुरक्षित सीट पर भाजपा को जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जो शिकस्त दी है उसकी चर्चा अगर सारे देश में हो रही है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष नितिन नबीन ने यहाँ से लगातार पांच चुनाव जीत कर इस विधानसभा क्षेत्र को भाजपा का अभेद्य किला बना दिया था परन्तु जब उन्होंने बांकीपुर सीट छोड़ कर राज्य सभा की सदस्यता ग्रहण कर ली तो उसके बाद हुए पहले ही चुनाव में भाजपा के हाथ से वह सीट निकल गई जिसे बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भाजपा का किला बताया था।जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में अपनी जीत के बाद कहा कि भाजपा के तीस साल के किले को हमने तीस दिनों में ध्वस्त कर दिया। गौर तलब है कि प्रशांत किशोर का यह पहला चुनाव था जिसमें उन्होंने 19 हजार मतों के अंतर से भाजपा उम्मीदवार नवीन सिन्हा को हराया। यहाँ विशेष रूप से रेखांकित किए जाने योग्य बात यह है कि प्रशांत किशोर द्वारा गठित जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनावों में 243 सीटों में से 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिनमें 236 सीटों पर उसे शोचनीय हार का सामना करना पड़ा था । बिहार विधानसभा के गत चुनावों में प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव लड़ने से परहेज किया था। बांकीपुर उपचुनाव जीतने के बाद प्रशांत किशोर बिहार विधानसभा में अपनी पार्टी के इकलौते विधायक होंगे।
यूँ तो राज्य विधानसभा में भाजपा की एक सीट कम हो जाने से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार की स्थिरता पर निकट भविष्य में कोई प्रभाव पड़ने की बात सोचना अभी जल्दबाजी होगा परन्तु मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सम्राट चौधरी के बैठने के बाद हुए पहले उपचुनाव में पार्टी की अपमानजनक पराजय ने मुख्यमंत्री पद पर उनके चयन ने जरूर सवाल खड़े कर दिए हैं दरअसल ये सवाल तो तभी उठने लगे थे जब भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्य सभा में भेजकर सम्राट चौधरी को उनका उत्तराधिकारी मनोनीत करने का फैसला किया था। राजनीतिक पंडितों ने भी उस समय इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि जब तब अपने बयानों से विवादों में बने रहने वाले सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के पीछे भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की वास्तविक मंशा आखिर क्या है।सम्राट चौधरी ने जिस दिन मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली उसी दिन से यह संकेत मिलने लगे थे कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सम्राट चौधरी के बैठने से राज्य की जनता खुश नहीं है और वे राज्य में कभी भी पार्टी का लोकप्रिय चेहरा बनने में सफल नहीं हो पाएंगे। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे भी शायद इसी संकेत को दोहरा रहे हैं।
दरअसल बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा के लिए अपशकुन के संकेत तो उसी दिन मिल गए थे जब भाजपा ने अपने पहले घोषित प्रत्याशी अभिषेक बंटी के स्थान पर नवीन सिन्हा को प्रत्याशी घोषित किया। यूँ तो अभिषेक बंटी ने पारिवारिक कारणों से चुनाव मैदान से हटने की घोषणा की थी परन्तु असली कारण कुछ और ही थे जिनकी वजह से भाजपा ने उनकी जगह नवीन सिन्हा को चुनाव मैदान में उतारा लेकिन प्रशांत किशोर के कद के सामने नवीन सिन्हा हर मामले में बौने साबित हुए। वे कभी भी न तो कैमरे के सामने सहज दिखाई दिए ,न ही प्रशांत किशोर के तर्कों की कोई काट प्रभावी तरीके से मतदाताओं के सामने रख पाए।चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने अपने एक बयान में दावा किया था कि भाजपा बांकीपुर में इतने वोट से हारेगी कि वह फिर जीवन भर यह कहने का साहस नहीं करेगी कि हम यहाँ से कुत्ते बिल्ली को भी खड़ा कर दें तो उसे जिता ले जाएंगे।हालांकि भाजपा की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर ने ऐसे किसी भी बयान का खंडन करते हुए कहा कि उनकी पार्टी अपने हर कार्यकर्ता का सम्मान करती है परंतु प्रशांत किशोर ने पूरे चुनाव में इसे भाजपा का बयान बयान बता कर इसे न केवल एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना लिया बल्कि वे बांकीपुर के मतदाताओं को भी अपनी बात से सहमत करने में सफल रहे। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पूरे समय इस अति आत्मविश्वास का शिकार बने रहे कि बांकीपुर में भाजपा के मजबूत किले में सेंध लगाने की ताकत किसी दल में नहीं है। उनके इसी मुगालते ने भाजपा की जीत की संभावनाओं को धूमिल कर दिया। दिल्ली में जंतर मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के समर्थन में बिहार के अनेक शहरों में हुए युवाओं के प्रदर्शन से निपटने के लिए राज्य की पुलिस ने जो बलप्रयोग किया उसने बांकीपुर में भाजपा के विरोध में माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। गौरतलब है कि बांकीपुर के मतदाताओं में एक तिहाई मतदाता युवा हैं। बांकीपुर में गत चुनाव में 41 प्रतिशत मतदान हुआ था जो इस बार घटकर 35 प्रतिशत रह गया। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के समर्थक मतदाताओं का एक बडे़ वर्ग अपने मताधिकार के प्रयोग के प्रति उदासीन रहा।उप चुनाव के कुछ ही समय पहले पुलिस एनकाउंटर में भरत तिवारी की मृत्यु से भड़के आंदोलन से पार्टी की चुनाव संभावना ओं पर पडने वाले प्रतिकूल प्रभाव का सम्राट चौधरी की सरकार सही आकलन करने से चूक गई। मुख्यमंत्री ने इस घटना के लिए जिम्मेदार पुलिस कर्मियों पर जब कड़ी कार्रवाई की तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने सुनियोजित चुनाव अभियान में जातिवाद और धर्म के आधार पर मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के बजाय शिक्षा ,रोजगार और विकास जैसे मुद्दों को प्रभावी तरह से उठाकर एक ओर जहां युवा पीढ़ी का समर्थन प्राप्त करने में सफलता हासिल की वहीं राजनीति में शुचिता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि उनकी पार्टी अपराध और राजनीति के घालमेल में विश्वास नहीं रखती। गौरतलब है कि बिहार के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में पढेलिखे मतदाता की बहुतायत है।ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशांत किशोर ने एक ओर जहाँ इस शिक्षित मतदाता वर्ग का अधिकतम समर्थन हासिल करने में कामयाबी हासिल की वहीं दूसरी ओर वे मुस्लिम- यादव वोट बैंक को भी आकर्षित करने में भी सफल हुए । भाजपा का चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कहा कि कृपया बिहार में किसी अच्छे व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करें। जाहिर सी बात है कि विधानसभा में भले ही वे जन सुराज पार्टी के इकलौते विधायक हों लेकिन अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए मुश्किलें पैदा करने में कोई संकोच नहीं करेंगे। वे अनेक राजनीतिक दलों के रणनीतिकार रह चुके हैं इसलिए उनको हल्के में लेना सम्राट चौधरी की मुश्किलों में इजाफा भी कर सकता है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)


