कर्मचारी अधिकार और सामाजिक सुरक्षा: कल्याणकारी राज्य का संवैधानिक दायित्व

शिवाजी बबन काले
(अध्यापक नवयुग स्कूल, पेशवा रोड,नई दिल्ली)

किसी भी लोकतांत्रिक समाज और लोक-कल्याणकारी राज्य का अस्तित्व उसके कार्यबल के सम्मान, सुरक्षा और गरिमा पर निर्भर करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 43 श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन-स्तर व निर्वाह मजदूरी प्रदान करने का निर्देश देता है, वहीं अनुच्छेद 21 मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार की गारंटी देता है। इस संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली, 8वें केंद्रीय वेतन आयोग की समयबद्ध सिफारिशें, महंगाई भत्ते (DA) का न्यायसंगत समायोजन और आवासीय परिसरों का जीर्णोद्धार केवल आर्थिक रियायतों की मांगें नहीं हैं, बल्कि ये संविधान-सम्मत मानवीय अधिकारों के अनिवार्य घटक हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक डी. एस. नकारा वाद (1983) में यह सिद्धांत स्थापित किया था कि पेंशन नियोक्ता द्वारा दिया जाने वाला कोई उपकार या अनुग्रह राशि नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा जीवन भर दी गई सेवाओं के बदले देय ‘विलंबित वेतन’ है। वर्ष 2004 में निश्चित लाभ वाली पुरानी पेंशन योजना को समाप्त कर शेयर बाजार पर आधारित राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) को लागू किया गया, जिसने सेवानिवृत्ति सुरक्षा को अनिश्चितताओं में धकेल दिया। कर्मचारियों के लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने हाल ही में ‘एकीकृत पेंशन योजना’ (UPS) की घोषणा कर 50 प्रतिशत सुनिश्चित पेंशन का ढांचा तो प्रस्तुत किया, किंतु यह व्यवस्था अभी भी कर्मचारियों के वेतन से 10 प्रतिशत मासिक कटौती पर आधारित है और इसमें सामान्य भविष्य निधि (GPF) का अभाव है। यही कारण है कि देश भर के कर्मचारी पूर्णतः गैर-अंशदायी पुरानी पेंशन व्यवस्था की बहाली को लेकर लगातार अपनी मांग उठा रहे हैं।
वेतन संरचना के स्तर पर, केंद्र सरकार द्वारा 8वें वेतन आयोग का गठन किया जा चुका है, जिसकी संदर्भ तिथि 1 जनवरी 2026 निर्धारित है। 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन और सर्वोच्च न्यायालय के रेप्टाकोस ब्रेट वाद (1992) में प्रतिपादित आयक्रॉयड फॉर्मूले के अनुसार न्यूनतम वेतन की गणना केवल भोजन, वस्त्र और आवास तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि इसमें बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक दायित्वों को भी जोड़ना अनिवार्य है। 7वें वेतन आयोग की विसंगतियों को दूर करते हुए कर्मचारी संगठनों ने वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण को शामिल कर परिवार को 5 उपभोग इकाइयों में आंकने और आईसीएमआर के वैज्ञानिक पोषण मानकों के आधार पर न्यूनतम मूल वेतन को ₹18,000 से बढ़ाकर ₹69,000 करने की मांग रखी है, जिससे लगभग 3.83 का फिटमेंट फैक्टर बनता है। साथ ही, ब्याज दरों और जीवन प्रत्याशा के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए पेंशन कम्यूटेशन की बहाली अवधि को 15 वर्ष से घटाकर 11 वर्ष करने का भी अकाट्य तर्क दिया गया है।
मुद्रास्फीति के दौर में महंगाई भत्ता स्थिर आय वाले कर्मचारियों की वास्तविक क्रय शक्ति को बनाए रखने का संवैधानिक सुरक्षा कवच है। डीए के 50 प्रतिशत पार होने पर मकान किराया भत्ते (HRA) और ग्रेच्युटी सीमा में स्वतः वृद्धि जैसे नियम लागू हो चुके हैं, परंतु वेतन आयोग के क्रियान्वयन में लगने वाले समय को देखते हुए पिछले वेतन आयोगों की तर्ज पर 50 प्रतिशत से अधिक हो चुके डीए को मूल वेतन में तत्काल समाहित करने और अंतरिम राहत देने की आवश्यकता बनी हुई है। निचले संवर्ग के कर्मचारियों के लिए बुनियादी सुविधाओं, सीवरेज, शुद्ध पेयजल और नियमित मरम्मत हेतु विशेष अवसंरचना बजट का प्रावधान कार्यस्थल पर मानवीय गरिमा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
वास्तविक लोक-कल्याणकारी राज्य का मूल्यांकन केवल सकल घरेलू उत्पाद अथवा राजकोषीय अनुशासन के आंकड़ों से नहीं, बल्कि अपने कार्यबल के प्रति उसकी संवेदनशीलता और न्यायप्रियता से होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कर्मचारियों द्वारा संस्थागत संवाद और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर अपने अधिकारों की सतत मांग करना व्यवस्था को उत्तरदायी बनाए रखने की एक स्वस्थ प्रक्रिया है। लोक-कल्याण और कर्मचारी अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं, जो अंततः राष्ट्र के प्रशासनिक तंत्र को सशक्त, पारदर्शी और आत्मनिर्भर बनाने का आधार बनते हैं।

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