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एनोस के खिलाफ एक साल से सुनवाई बंद

रांची : पारा टीचर मनोज की हत्या के मामले में विधायक एनोस एक्का के खिलाफ दायर याचिका पर करीब एक साल से सुनवाई बंद है. हत्याकांड के अभियुक्त बारूद गोप को सरकारी गवाह बनाये जाने पर उभरे कानूनी विवाद में हाइकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है. विधायक एनोस एक्का ने बारूद गोप को सरकारी गवाह बनाये जाने को चुनौती दी थी.
इस मामले में सुनवाई की पहली तिथि पर सरकार की ओर से कोई वकील हाइकोर्ट में हाजिर ही नहीं हुआ. अब मनोज के पिता ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर हाइकोर्ट में लंबित मामले को शीघ्र निबटाने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजे गये पत्र में पारा टीचर के पिता ने लिखा है कि विधायक एनोस एक्का ने पीएलएफआइ के उग्रवादियों की मदद से 26 नवंबर 2014 को स्कूल से उनके बड़े बेटे को अगवा कर लिया और उसकी हत्या करा दी. पुलिस ने जांच के बाद सभी साक्ष्य जुटाये और विधायक व पीएलएफआइ उग्रवादी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया. गिरफ्तारी के बाद पीएलएफआइ उग्रवादी बारूद गोप ने सरकारी गवाह बनने की इच्छा जतायी. सक्षम न्यायालय ने इसे स्वीकार कर लिया. इसके बाद विधायक ने सक्षम न्यायालय के फैसले को हाइकोर्ट में चुनौती दी. हाइकोर्ट ने विधायक की क्रिमिनल रिट याचिका 92-16 पर चार जनवरी 2017 को सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. इसलिए सुप्रीम कोर्ट हाइकोर्ट में लंबित इस मामले का निबटारा जल्दी करने का निर्देश दे, ताकि उनके बेटे को न्याय मिल सके.
सेशन ट्रायल केस नंबर 29-2015 में बारूद गोप ने सरकारी गवाह बनने के लिए आवेदन दिया. सत्र न्यायालय ने सात अप्रैल 2016 को सरकारी वकील और एनोस एक्का के अधिवक्ता की दलील सुनने के बाद बारूद गोप की अर्जी स्वीकार कर ली और उसे सरकारी गवाह बनाने का फैसला किया. विधायक ने इस फैसले को हाइकोर्ट में चुनौती दी. न्यायमूर्ति आर मुखोपाध्याय की अदालत में 23 जून 2016 को मामले की सुनवाई हुई. एनोस एक्का की ओर से दलील दी गयी कि बारूद गोप ही हत्या का मुख्य आरोपी है. उसके खिलाफ 50 गंभीर मामले दर्ज हैं. ऐसी स्थिति में उसे सरकारी गवाह नहीं बनाया जाना चाहिए. सुनवाई के दिन सरकार की ओर से कोई वकील हाजिर नहीं हुआ. इसलिए हाइकोर्ट में याचिका दाता का पक्ष सुनने के बाद निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी. साथ ही तीन हफ्ते बाद मामले को कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया. इसके बाद यह मामला कई बार कोर्ट में आया, इसमें समय मांगा जाता रहा. कोर्ट में चार जनवरी 2017 को सुनवाई हुई. इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.

कितने दिन फैसला सुरक्षित रखना है यह निर्धारित नहीं
हाइकोर्ट में माननीय न्यायाधीश कितने दिनों तक फैसला सुरक्षित रख सकते हैं, इससे संबंधित कोई नियम नहीं है. नियमानुसार जो फैसला सुरक्षित रखता है, वही सुनाता है. अगर किसी माननीय न्यायाधीश ने फैसला सुरक्षित रखा हो, तो रजिस्ट्री शाखा द्वारा उन्हें इसकी याद दिलायी जानी चाहिए. फैसला सुरक्षित रखनेवाले माननीय न्यायाधीश फिर से उसी बेंच में आने के बाद फैसला सुनाते हैं, जिस बेंच में रहते हुए इसे सुरक्षित रखा था. इसके अलावा अपने चेंबर में भी फैसला सुना सकते हैं.
जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद , (सेवानिवृत्त)

 

साभार: प्रभात खबर

टीम डिजिटल

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