रेलवे स्टेशन से दिल्ली की सड़कों तक: पूजा की हिम्मत ने बदली जिंदगी

नई दिल्ली। कुछ कहानियां सिर्फ संघर्ष की दास्तान नहीं होतीं, बल्कि यह बताती हैं कि मुश्किल हालात के सामने इंसान कितनी दूर तक जा सकता है। पूजा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कभी जिस लड़की के लिए दो वक्त का खाना जुटाना सबसे बड़ी चुनौती था, वही आज दिल्ली की सड़कों पर आत्मविश्वास के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही है।

पूजा ने बहुत कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। कई बार दिनभर मेहनत करने के बाद उन्हें मेहनताने के रूप में सिर्फ दो रोटियां और एक कप चाय मिलती थी। महज 13 साल की उम्र में पिता का निधन हो गया। घर की जिम्मेदारियां अचानक बढ़ गईं। उनकी मां को जो भी काम मिलता, वह करतीं और पूजा भी घर चलाने में मदद के लिए छोटे-मोटे काम करने लगीं।

भूख ने दिखाया बड़े सपनों का रास्ता

पूजा के लिए गरीबी सिर्फ एक मजबूरी नहीं रही, बल्कि उसने उन्हें बड़े सपने देखने की वजह भी दी। महज 15 साल की उम्र में उन्होंने झारखंड स्थित अपना घर छोड़कर अकेले दिल्ली आने का फैसला किया।

दिल्ली पहुंचने के बाद शुरुआती दिनों में रेलवे स्टेशन ही उनका ठिकाना बना। शहर में रहने और खाने का इंतजाम करने के लिए उन्होंने घरों, दुकानों और होटलों के रिसेप्शन पर सफाई जैसे काम किए। जो भी काम मिला, उन्होंने किया और आगे बढ़ती रहीं।

फिर आई महामारी, जिसने उनकी रोजी-रोटी का सहारा भी छीन लिया। लॉकडाउन और बदलते हालात के बीच उनका काम रातों-रात खत्म हो गया।

फुटपाथ पर मिला जिंदगी बदलने वाला सुझाव

मुश्किल दौर में एक दिन पूजा फुटपाथ पर बैठी थीं। तभी एक राहगीर ने उनसे पूछा कि वह डिलीवरी पार्टनर के तौर पर काम क्यों नहीं करतीं।

पूजा ने इससे पहले किसी महिला को खाना डिलीवर करते नहीं देखा था। लेकिन उनके सामने सवाल यह था कि जब जिंदगी में इतने मुश्किल काम कर चुकी हैं, तो यह काम क्यों नहीं?

उन्होंने साइकिल से फूड डिलीवरी शुरू कर दी।

इसके बाद दिल्ली की सड़कें उनकी नई कार्यस्थली बन गईं। वह साइकिल से शहर के अलग-अलग हिस्सों में खाना पहुंचाती रहीं और अपनी कमाई के लक्ष्य के मुताबिक काम के घंटे तय करती थीं। कई बार देर रात तक भी वह डिलीवरी करती थीं।

दरवाजे पर पहुंचतीं तो चौंक जाते थे ग्राहक

जब पूजा खाना लेकर ग्राहकों के दरवाजे पर पहुंचतीं, तो कई लोग उन्हें देखकर हैरान रह जाते। महिला डिलीवरी पार्टनर के रूप में उन्हें देखकर ग्राहक अक्सर उनका उत्साह बढ़ाते और कहते कि उन्हें देखकर गर्व महसूस होता है।

लेकिन पूजा के लिए यह सिर्फ लोगों की तारीफ पाने का काम नहीं था। यह उनके लिए आत्मनिर्भर बनने और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने की कोशिश थी।

चार साल की मेहनत के बाद मिला सम्मान

लगातार करीब चार साल तक मेहनत करने के बाद पूजा के काम और समर्पण को पहचान मिली। जोमैटो ने उन्हें ‘EV बाजार’ पहल के तहत इलेक्ट्रिक बाइक उपहार में दी।

यह पहल डिलीवरी पार्टनर्स को पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने में मदद करने के लिए आयोजित की जाती है।

इलेक्ट्रिक बाइक मिलने के बाद पूजा के लिए दिल्ली की सड़कों पर सफर और काम का एक नया अध्याय शुरू हुआ।

आज अपने पैरों पर खड़ी हैं पूजा

आज पूजा दिल्ली में किराए के घर में अकेले रहती हैं और अपने गांव में रह रही मां की आर्थिक मदद करती हैं। जिस जिंदगी की शुरुआत अभाव और संघर्ष से हुई थी, उसमें अब आत्मनिर्भरता और अपने फैसले लेने का आत्मविश्वास शामिल है।

कभी रेलवे स्टेशन पर रात गुजारने वाली पूजा आज उसी दिल्ली में बेखौफ होकर अपनी राह तय कर रही हैं।

उनकी कहानी यह याद दिलाती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इंसान रास्ते तलाशना बंद न करे, तो एक दिन वही रास्ते उसकी पहचान बन जाते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.