तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व बचाने की लड़ाई में कैसे जीत पाएंगी ममता

कृष्णमोहन झा

पश्चिम बंगाल में लगातार पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को हाल के विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार ने अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया है।तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पार्टी को टूटने से बचाने के लिए यद्यपि हरसंभव प्रयास कर रही हैं लेकिन हाल के पार्टी के अंदर चल रहे घटना क्रम से तो इसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि पार्टी के अस्तित्व पर आए इस गंभीर संकट को टालना ममता बनर्जी के लिए अब लगभग नामुमकिन जैसा हो गया है । राज्य में पहली बार सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी के प्रति आकर्षित होने वाले तृणमूल कांग्रेस के नवनिर्वाचित विधायकों की संख्या में जिस तरह तेजी से इजाफा हो रहा है उससे ममता बनर्जी बेहद परेशान दिखाई दे रही हैं।राजनीति के इस मोड पर तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई देने से उनकी ही पार्टी के अधिकांश नेता जिस तरह परहेज कर रहे हैं उससे यह कहावत याद आ जाती है कि लोग ऊगते सूर्य को ही नमस्कार करते हैं। जब वे धरना देती हैं। आज यह स्थिति बन चुकी है कि उनके साथ धरने पर बैठने के लिए तृणमूल कांग्रेस के मुट्ठी भर विधायक ही जुटते हैं। ममता बनर्जी के द्वारा विगत दिनों पार्टी विधायक दल की जो बैठक बुलाई गई थी उस बैठक में भी मात्र 20 विधायकों ने ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराना जरूरी समझा। पार्टी में फूट के संकेत वहीं से मिलने लगे थे ममता बनर्जी के लिए निसंदेह यह चिंता का विषय है कि 28 साल पहले कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने जिस तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी थी उसमें उनको ही अलग थलग करने की कोशिश करने वाले पार्टी नेताओं की संख्या रोज बढ़ रही है और गौरतलब बात तो यह है कि पार्टी में उनके वर्चस्व को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से चुनौती देने वाले नेता अपनी कोशिशों में लगातार सफल भी हो रहे हैं। यह भी कम दिलचस्प बात नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस के ऐसे कई नेता राज्य में पहली बार सत्ता में आई भाजपा सरकार के संपर्क में भी ‌‌‌‌बने ‌‌‌‌हुए हैं। इसीलिए ममता बनर्जी को यह चिंता सताना स्वाभाविक है कि अतीत में महाराष्ट्र में जिस तरह एकनाथ शिंदे और अजित पवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने शिवसेना और राष्ट्र वादी कांग्रेस को दो फाड़ कर दिया था उसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना कहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को न करना पडे।
दरअसल तृणमूल कांग्रेस के नवनिर्वाचित 80 विधायकों में से 58 बागी विधायकों द्वारा गत दिवस ऋतव्रत बनर्जी को सर्वसम्मति से अपना नेता चुन लिए जाने के बाद अब ममता बनर्जी को अब इस संशय में नहीं रहना चाहिए कि पार्टी को टूटने से बचाने के लिए उनकी कोई भी योजना अब कारगर साबित हो सकती है। ममता बनर्जी गुट के पास अब तृणमूल कांग्रेस के मात्र 22 विधायक बचे हैं। ये 22 विधायक अब सदन के अंदर विपक्ष में बैठेंगे परंतु यह संख्या 294 सदस्यीय विधानसभा के 10 प्रतिशत से कम होने के कारण उन्हें मान्यता प्राप्त विपक्षी दल का दर्जा नहीं मिल सकेगा। इसके विपरीत बागी गुट के नेता ऋतव्रत बनर्जी को चूंकि 58 विधायकों का समर्थन हासिल है इसलिए विधानसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता पद पर उनका दावा स्वीकार कर लिया ।इतना ही, बिना किसी विलंब के उन्हें विधानसभा भवन में विपक्ष के नेता के लिए निर्धारित कक्ष भी आवंटित कर दिया गया । ऋतव्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उनका गुट ही असली तृणमूल कांग्रेस है।उन पर दलबदल कानून भी लागू नहीं होगा क्यों इस बागी गुट में तृणमूल कांग्रेस विधायक दल की कुल संख्या 80 के ‌‌‌‌ दो तिहाई से अधिक सदस्य शामिल हैं। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि यह गुट आगे चलकर तृणमूल कांग्रेस के चुनावचिन्ह और नाम पर भी अपना दावा पेश करने से परहेज नहीं करेगा। गौर तलब है कि ऋतव्रत बनर्जी और सांदीपन साहा को ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोप में विगत दिनों तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया था। ऋतव्रत बनर्जी ने पिछले माह नईदिल्ली स्थित बंग भवन में मुख्य मंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाक़ात की थी। पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी पार्टी से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले ऋतव्रत बनर्जी बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये थे और जल्द ही उन्होंने ममता बनर्जी का विश्वास भी हासिल कर लिया था परंतु ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल कांग्रेस के दूसरे सबसे बडे़ नेता अभिषेक बनर्जी का पार्टी के अंदर वर्चस्व को उन्हें रास नहीं आया। गौर तलब है कि अभिषेक बनर्जी ने पार्टी में जिस कारपोरेट संस्कृति को बढ़ावा दिया वह तृणमूल कांग्रेस के क ई वरिष्ठ नेताओं के असंतोष की बड़ी वजह बनी। पार्टी के असंतुष्ट नेताओं में पश्चिम बंगाल से निर्वाचित लोकसभा सदस्य काकोली घोष दस्तीकार भी शामिल हैं जिन्हें ममता बनर्जी ने विधान सभा चुनावों में पार्टी में करारी हार के बाद लोकसभा में पार्टी की चीफ़ व्हिप के पद से हटा दिया था। इसके बाद काकोली घोष ने पार्टी में सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया था। काकोली घोष ने लोकसभा में पार्टी के वरिष्ठ सदस्य कल्याण बनर्जी पर उनके साथ दुर्व्यवहार के आरोप भी लगाए। तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीतिकार संस्था आई पैक को अभिषेक बनर्जी के संरक्षण ने भी तृणमूल कांग्रेस के अंदर असंतोष को और बढावा दिया। तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सदस्य सायोनी घोष ने भी विगत कुछ दिनों से पार्टी मामलों से जो दूरी बना ली है वह भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुल मिलाकर विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार तृणमूल कांग्रेस के अस्तित्व पर ऐसे गंभीर संकट का सबब बन गई है जो आगे आने वाले समय में और गहरा सकता है।

 


(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

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