डॉ. शैलेंद्र पांड्या
राजस्थान का अनोखापन ही उसकी शान है। शायद यही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां सब कुछ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होते हुए भी साथ-साथ चलता है। पुरानी परंपराएं और आधुनिकता यहां इस तरह घुल-मिलें हैं कि देखकर हैरानी होती। मगर इस चमक-दमक के पीछे एक अलग ही दुनिया है, जहां सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उलझनें आज भी लोगों की जिंदगी को मुश्किल बनाती हैं। एक तरफ तो राजस्थान में अच्छे-अच्छे आधुनिक शिक्षण संस्थान हैं, लेकिन दूसरी तरफ हालत ये है कि हर चार में से एक लड़की की शादी 18 साल से पहले ही कर दी गई। जनगणना 2011 के मुताबिक राज्य में 90 लाख से ज्यादा आदिवासी आबादी है, जिसमें से तो कुछ जिलों में तो हालात और भी बदतर हैं जहां लगभग आधी लड़कियों की शादी बालिग होने के पहले ही कर दी जाती है। या यूं कहें कि इस खूबसूरत और समृद्ध राज्य के कई हिस्सों ऐसे हैं जहां हर दूसरे बच्चे का बाल विवाह कर उसे शोषण के अंतहीन चक्र में धकेल दिया जाता है।
राजस्थान के आदिवासी इलाकों में आज भी बाल विवाह से जुड़ी कई परंपराएं तो ऐसी हैं जिनके निभाने के लिए छोटे-छोटे बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर दी जाती है। कुछ ऐसी ही है भील और गरासिया जनजाति का ‘खींचना’ त्योहार, जिसमें छोटे लड़के-लड़कियां खुद अपनी जोड़ी चुनकर साथ रहने लगते हैं। देखने में यह उनकी अपनी मर्जी लगती है, लेकिन है ये बाल विवाह। इसी तरह कुछ समुदायों में ‘मौसर’ की परंपरा है। किसी की मौत के बारहवें दिन जो भोज होता है, उसी में कभी-कभी बच्चों की शादी भी कर दी जाती है। इसके अलावा ‘आटा-साटा’, ‘नाता प्रथा’ और ‘डापा’ जैसी परंपराएं भी हैं, जिनका जिक्र अक्सर इन इलाकों में होने वाले बाल विवाह के संदर्भ में किया जाता है। आसान शब्दों में कहें तो ये ऐसी पुरानी रस्में हैं जिनकी वजह से आज भी कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है।
हालांकि इन बातों के अलावा एक दूसरी सकारात्मक धारा भी बह रही है, जो काफी प्रभावी और उम्मीद जगाने वाली है। आज राजस्थान सरकार, पुलिस-प्रशासन, न्यायपालिका और जमीनी स्तर पर काम करने वाले संगठन मिलकर एक बड़ा बदलाव के वाहक बन हैं, जो अपने आप में अनोखा है और महत्वपूर्ण भी। ऐसा पहले कभी इस पैमाने पर नहीं हुआ था। राज्य स्तर पर सूबे की न्यायपालिका ने बाल विवाह के खिलाफ इतने सक्रिय कदम उठाए हैं कि पूरा देश अब इसे एक मिसाल के तौर पर देख रहा है। कुछ साल पहले अक्षय तृतीया यानी अखा तीज के आसपास बाल विवाह के बढ़ते मामलों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने पंचायत प्रमुखों और गांव के मुखिया को सीधे जिम्मेदार ठहराया कि अगर उनके क्षेत्र में कोई बाल विवाह होता है,तो इसके लिए उनकी जवाबदेही होगी।
यह एक बड़ा और साहसी कदम था, क्योंकि जो बाल विवाह पहले परंपरा के नाम पर छुपा दिया जाता था, अब उसे राज्य की सबसे बड़ी अदालत खुले तौर पर गलत ठहरा रही थी। यह सिर्फ एक आदेश नहीं था, बल्कि यह इस समस्या को खुले तौर पर स्वीकार करना और इसे पूरी ईमानदारी और तेजी से खत्म करने की ठोस कोशिश थी। इस फैसले ने बदलाव की शुरुआत की, लेकिन एक बात जो इस बदलाव को लगातार आगे बढ़ा रही है वह है हर ब्लॉक और हर गांव की सक्रियता। अब लोग सिर्फ बाल विवाह हो जाने के बाद ही प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि पहले से ही सतर्क रहकर इसे रोकने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठाते हैं।
कुछ महीने पहले उदयपुर की एक फैमिली कोर्ट ने एक दुर्लभ और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने एक 16 साल की लड़की की शादी को पूरी तरह अवैध और शून्य घोषित कर दिया। यह फैसला इसलिए खास था क्योंकि भारत में ज्यादातर बाल विवाह के मामले कभी अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते, उन्हें कानूनी तौर पर चुनौती ही नहीं दी जाती। हमारे समाज में आज भी बेटियों से कहा जाता है कि ससुराल ही उनका अंतिम ठिकाना है और वहीं से उनकी अर्थी निकलनी चाहिए। ऐसे में किसी नाबालिग लड़की के लिए आवाज उठाना कि मुझे यह शादी नहीं करनी, यह सोचना भी मुश्किल है। जिन गिने-चुने मामलों में ऐसी अपील होती भी है, वे आमतौर पर तब आती हैं जब लड़की 18 साल की हो जाती है। लेकिन 16 साल की उम्र में खुद आगे आकर शादी को खत्म करने की मांग करना, यह सच में असाधारण है। और वह अकेली नहीं है। उसकी छोटी बहन, जो अभी 14 साल की है, वह भी हमारे पास आई है और हम उसकी शादी को भी कानूनी तौर पर खत्म करवाने की कोशिश कर रहे हैं।
ये वो मिसालें और रास्ते हैं जो पहले कभी थे ही नहीं। इसलिए भी अहम हैं क्योंकि ये कदम राजस्थान की उन आदिवासी समुदायों में उठाए जा रहे हैं, जो अपनी परंपराओं को लेकर हमेशा से बेहद सख्त रहे हैं और जिन पर कानून का भी कोई खास असर नहीं पड़ता था। लेकिन अब, हर ऐसे मामले के साथ हम उन समुदायों में भी बेटियों के लिए एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर जीवन की राह बना रहे हैं। और इन बदलावों के पीछे उन संगठनों की अथक मेहनत है जो जमीन पर काम कर रहे हैं। गायत्री सेवा संस्थान (जीएसएस), जो बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन का सहयोगी है। नेटवर्क अपने 250 से भी ज्यादा सहयोगियों के साथ पूरे देश में कानूनी हस्तक्षेप के जरिए बदलाव ला रहा है। अकेले राजस्थान के आदिवासी बहुल जिलों उदयपुर, सलूंबर, प्रतापगढ़ और चित्तौड़गढ़ में जीएसएस ने पिछले एक साल में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर कोर्ट के आदेश से छह बाल विवाह रुकवाए और कानूनी दखल के जरिए 176 बाल विवाहों को होने से रोका।
यह पूरे इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव है। कानून पहले भी मौजूद थे, लेकिन अक्सर उनका इस्तेमाल सिर्फ प्रतिक्रिया के तौर पर होता था, यानी बाल विवाह होने के बाद ही कार्रवाई होती थी, रोकने के लिए नहीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जहां समझाने-बुझाने से काम नहीं बनता, वहां सरकारी तंत्र कानूनी दखल को एक मजबूत हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है और यह आदिवासी इलाकों में भी हो रहा है। जब कानूनी हस्तक्षेप अपवाद नहीं, बल्कि नियम बन जाएगा, तभी हम आदिवासी क्षेत्रों के साथ ही पूरे राज्य को 2030 से पहले बाल विवाह मुक्त कर पाएंगे।
(लेखक – डॉ. शैलेंद्र पांड्या, निदेशक, गायत्री सेवा संस्थान, उदयपुर)


