संपतिया उइके
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है। एक ऐसी महिला, जिसने अपने जीवन में अभाव, संघर्ष और सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए सार्वजनिक जीवन में स्थान बनाया हो, वह भली-भांति समझ सकती है कि अवसर मिलने पर महिलाएं समाज को किस दिशा में ले जा सकती हैं।
आज जब देश में महिला आरक्षण को लेकर ऐतिहासिक पहल की जा रही है, तब यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने एक बार फिर अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के चलते इस महत्वपूर्ण विधेयक को पारित नहीं होने दिया।
विश्व के लोकप्रिय राजनेता माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में “नारी शक्ति वंदन” को 21वीं सदी का “महान यज्ञ” बताया। यह शब्द केवल अलंकार नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी सोच का प्रतीक है। यह उस भारत की कल्पना है, जहां महिलाएं केवल घर की सीमाओं तक सीमित न रहकर नीति निर्माण और नेतृत्व की धुरी बनें।
संसद में महिला आरक्षण विधेयक का पारित न हो पाना केवल एक विधायी असफलता नहीं, बल्कि विपक्ष की मानसिकता का आईना है। जब देश की आधी आबादी को उनका अधिकार देने की बात आई, तब कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने भ्रम फैलाने, प्रक्रिया को उलझाने और अंततः इसे रोकने का प्रयास किया। मतदान के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि यह विधेयक पारित हो सकता था, यदि विपक्ष ने ईमानदारी दिखाई होती। लेकिन उन्होंने जानबूझकर इसका विरोध किया।
यह वही दल हैं, जिन्होंने वर्षों तक महिला आरक्षण को केवल एक राजनीतिक मुद्दा बनाकर रखा। जब इसे लागू करने की वास्तविक पहल हुई, तब उन्होंने अपने असली इरादे दिखा दिए। यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के साथ अन्याय है।
महिला आरक्षण का 33 प्रतिशत प्रावधान केवल संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना को संतुलित करने का माध्यम है। इससे महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी मिलेगी, नीति निर्माण में संवेदनशीलता बढ़ेगी और समाज के हर वर्ग की आवाज को मंच मिलेगा। विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं के लिए यह अवसर ऐतिहासिक साबित होगा।
मेरे अपने जीवन का अनुभव यह बताता है कि जब एक महिला को अवसर मिलता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए काम करती है। ग्राम पंचायत से लेकर उच्च स्तर तक, महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का परिचय दिया है। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं ने आर्थिक और सामाजिक बदलाव की नई धारा प्रवाहित की है। यह अनुभव हमें यह विश्वास दिलाता है कि संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी देश को नई दिशा देगी।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इस विधेयक को लेकर जो रवैया अपनाया है, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौलने का काम किया। वे यह भूल गए कि यह किसी दल का नहीं, बल्कि देश का मुद्दा है; यह सत्ता का नहीं, बल्कि समाज का प्रश्न है।
आज भारत की महिलाएं जागरूक हैं, आत्मनिर्भर हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। वे अब किसी भी प्रकार के भेदभाव या उपेक्षा को स्वीकार करने वाली नहीं हैं। संसद में जो हुआ, वह निश्चित रूप से निराशाजनक है, लेकिन यह संघर्ष का अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत है।
देश के महानायक प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां महिलाओं को केंद्र में रखकर नीतियां बनाई जा रही हैं। महिला आरक्षण विधेयक राजनीति में संतुलन लाएगा, नेतृत्व में विविधता बढ़ाएगा और समाज को अधिक समावेशी बनाएगा। यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का प्रारंभ है।
आज का यह घटनाक्रम इतिहास में दर्ज होगा—एक ओर महिलाओं को सशक्त बनाने का संकल्प और दूसरी ओर उसे रोकने की राजनीति। कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने यह साबित कर दिया है कि वे महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के पक्ष में नहीं हैं।
लेकिन यह भी सत्य है कि भारत की नारी शक्ति अब रुकने वाली नहीं है। यह “नारी शक्ति वंदन” का यज्ञ जारी रहेगा और एक दिन अवश्य सफल होगा। देश की महिलाएं अपने अधिकारों के लिए जाग चुकी हैं, और वे लोकतांत्रिक माध्यमों से अपना जवाब अवश्य देंगी।
नारी सशक्तिकरण का यह अभियान केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत के सामाजिक और राजनीतिक भविष्य को नई दिशा देगा।

(लेखिका, मध्यप्रदेश शासन की लोकस्वास्थ्य यांत्रिकीय मंत्री है)

