नारी शक्ति देंगी विपक्षी दलों को करारा जवाब, महिला आरक्षण बिल पर सियासत और सवाल

डॉ धनंजय गिरि

महिला आरक्षण विधेयक को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर तीखे टकराव के दौर में है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में इस विधेयक के पारित न हो पाने पर गहरा अफसोस जताते हुए देश की माताओं, बहनों और बेटियों से माफी मांगी। साथ ही उन्होंने विपक्षी दलों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “नारी शक्ति की उड़ान को रोका गया” और इसके लिए विपक्ष की “संकीर्ण और स्वार्थी राजनीति” जिम्मेदार है।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने साफ कहा कि महिला आरक्षण बिल को पारित कराने में सरकार सफल नहीं हो सकी, जो कि देश की आधी आबादी के लिए एक बड़ा अवसर हो सकता था। उनका यह स्वीकारोक्ति भरा बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक ओर जिम्मेदारी का संकेत है, तो दूसरी ओर विपक्ष पर सीधा हमला भी। मोदी ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और समाजवादी पार्टी जैसे दलों को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने जनहित से ऊपर राजनीति को रखा।
गौर करने योग्य यह भी है कि

प्रधानमंत्री का यह भी कहना था कि कुछ विपक्षी दलों ने विधेयक के गिरने पर जश्न मनाया, जो न केवल राजनीतिक असहमति बल्कि महिलाओं के सम्मान के खिलाफ भी है। उन्होंने इसे “नारी के आत्मसम्मान पर चोट” बताया और कहा कि देश की महिलाएं इसे भूलेंगी नहीं। यह बयान भावनात्मक अपील के साथ-साथ राजनीतिक चेतावनी भी देता है कि आने वाले समय में यह मुद्दा चुनावी विमर्श का केंद्र बन सकता है।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विपक्ष का आरोप रहा है कि सरकार ने विधेयक को पर्याप्त तैयारी और व्यापक सहमति के बिना पेश किया। कई विपक्षी नेताओं, जिनमें प्रियंका गांधी भी शामिल हैं, ने इसे राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम बताया। उनके अनुसार, महिलाओं से जुड़े जमीनी मुद्दोंकृजैसे सुरक्षा, रोजगार और न्यायकृपर ठोस प्रगति के बिना केवल आरक्षण की बात अधूरी है।

संसदीय गणित भी इस बहस का अहम पहलू है। लोकसभा में इस विधेयक को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी, जबकि इसके पक्ष में 298 वोट ही मिल सके और 230 सांसदों ने विरोध किया। यह आंकड़ा बताता है कि राजनीतिक सहमति का अभाव इस विधेयक की सबसे बड़ी बाधा बना।

इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने और उनमें 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए सुनिश्चित करने का प्रस्ताव था। साथ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में आरक्षण लागू किया जाना था। स्पष्ट है कि यह एक व्यापक और संरचनात्मक बदलाव का प्रयास था, जिसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ सर्वदलीय सहमति भी जरूरी थी।

सवाल यह है कि क्या महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को भी राजनीतिक खेमों में बांट देना उचित है? क्या सरकार और विपक्ष दोनों मिलकर इस दिशा में कोई साझा रास्ता नहीं निकाल सकते थे? नारी शक्ति को सशक्त बनाने का दावा तभी सार्थक होगा, जब यह केवल भाषणों और आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर ठोस नीति और सहमति में बदले। आखिरकार, यह मुद्दा किसी एक दल की जीत या हार का नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के अधिकार और सम्मान का है। यदि राजनीतिक दल इस मूल भावना को समझें, तो शायद “नारी शक्ति की उड़ान” को वास्तव में पंख मिल सकें।

(लेखक चिंतक, विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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