रावण के दस सिरों से बड़ा उसका अहंकार था, जिसने उसके साम्राज्य का अंत किया : कृष्णमोहन झा

 

भोपाल। “रावण का पुतला जलाना परंपरा है, लेकिन रावण की प्रवृत्तियों को मिटाना हमारा दायित्व है। ज्ञान और शक्ति से संपन्न होने के बावजूद रावण का अहंकार उसके विवेक पर हावी हो गया और यही उसके पतन का कारण बना।” यह बात वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक कृष्णमोहन झा ने संस्कार उत्सव समिति के 24वें आयोजन में मुख्य वक्ता के रूप में कही।

अपने उपन्यास ‘त्रिजटा’ के लेखन के दौरान रावण के चरित्र को गहराई से समझने के अनुभव साझा करते हुए श्री झा ने कहा कि रावण विद्वान, शिवभक्त और अपार सामर्थ्य का स्वामी था, लेकिन वह अपनी इच्छाओं को मर्यादा से ऊपर रखने की भूल कर बैठा। उन्होंने कहा कि ज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ मर्यादा और सामर्थ्य के साथ विनम्रता न हो, तो पतन अवश्यंभावी है।

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि विजयादशमी पर केवल रावण के पुतले का दहन न करें, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, अन्याय और नारी अपमान जैसी बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प भी लें। उन्होंने कहा, “राम का जयघोष करना आस्था है, राम के आदर्शों पर चलना सच्ची विजयादशमी है।”

आयोजन की सबसे विशिष्ट परंपरा के तहत संस्कार उत्सव समिति प्रतिवर्ष रावण के पुतले की ऊंचाई एक फीट कम करती है। इसी क्रम में इस वर्ष 41 फीट ऊंचे रावण का दहन किया गया। यह परंपरा बुराइयों को क्रमशः कम करने और समाज में सकारात्मक बदलाव का प्रतीकात्मक संदेश देती है।

कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष तपन भौमिक, भोपाल की महापौर मालती राय, समिति अध्यक्ष डॉ. शांतनु शर्मा तथा संयोजक सुरजीत चौहान उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन पंकज श्रीवास्तव एवं राधिका जी ने किया।

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