मिट्टी बची तो खेती बचेगी: ‘खेत बचाओ अभियान’ को मिल रहा व्यापक समर्थन

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की घटती उर्वरता, भूजल स्तर में गिरावट और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग जैसी चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार का ‘खेत बचाओ अभियान’ देशभर में किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है।

अभियान का मूल संदेश है— “मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी, किसान समृद्ध होगा और देश आगे बढ़ेगा।” कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ मिट्टी ही कृषि उत्पादन की आधारशिला है। यदि मिट्टी की गुणवत्ता लगातार गिरती रही तो फसल उत्पादन में कमी, खेती की लागत में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

इस अभियान के तहत इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) किसानों के बीच मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रति जागरूकता फैलाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने कई क्षेत्रों में मिट्टी के पोषक संतुलन को प्रभावित किया है।

विशेषज्ञों के अनुसार नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उत्पादकता प्रभावित हुई है। इसके साथ ही लाभकारी सूक्ष्मजीवों और जैविक कार्बन की मात्रा में कमी आने से मिट्टी की जल धारण क्षमता भी कमजोर हुई है।

अभियान में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना को विशेष महत्व दिया जा रहा है। इस योजना के माध्यम से किसानों को उनकी भूमि में पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति की वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराई जाती है तथा आवश्यकतानुसार उर्वरकों के उपयोग की सलाह दी जाती है। इससे न केवल उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित होता है, बल्कि खेती की लागत घटाने और दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देना भी अभियान का प्रमुख लक्ष्य है। किसानों को गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट तथा हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है ताकि मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़े और उसकी उत्पादकता बनी रहे। इसके लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है।

बढ़ते जल संकट को देखते हुए अभियान में जल संरक्षण पर भी विशेष बल दिया जा रहा है। किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, वर्षा जल संचयन तथा अन्य जल-कुशल तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। साथ ही बीज उपचार, संतुलित पोषण, आधुनिक बुवाई तकनीक, फसल विविधीकरण तथा स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप फसलों और बीजों के चयन के बारे में भी जागरूक किया जा रहा है।

अभियान का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य किसानों को नकली उर्वरकों और कीटनाशकों से होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाना है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों की पहचान और उनके सही उपयोग के संबंध में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

आईपीएल के प्रबंध निदेशक डॉ. पी. एस. गहलौत ने कहा कि संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों का समुचित प्रयोग मिट्टी की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के बीच मृदा संरक्षण और संतुलित पोषक प्रबंधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

उन्होंने किसानों से टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही समृद्ध किसान और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था की मजबूत नींव है।

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