ओडिशा में ओलिव रिडले कछुओं पर WII-अडानी फाउंडेशन अध्ययन की पहली रिपोर्ट जारी, संरक्षण के लिए मिले अहम वैज्ञानिक संकेत

भुवनेश्वर: ओडिशा सरकार ने ओलिव रिडले समुद्री कछुओं के संरक्षण और उनके आवागमन को समझने के लिए किए जा रहे तीन वर्षीय वैज्ञानिक अध्ययन की पहले वर्ष की रिपोर्ट जारी की है। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के नेतृत्व में चल रहे इस अध्ययन में सैटेलाइट टेलीमेट्री, नाव से सर्वेक्षण और तटरेखा विश्लेषण का इस्तेमाल किया गया है।

रिपोर्ट का विमोचन ओडिशा सरकार में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन तथा श्रम एवं ईएसआई राज्य मंत्री गणेश राम सिंह खुटिया ने किया। अध्ययन में ओडिशा वाइल्डलाइफ ऑर्गनाइजेशन, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, धामरा पोर्ट कंपनी लिमिटेड (DPCL) और अडानी फाउंडेशन ने सहयोग किया है। DPCL, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) का हिस्सा है।

कार्यक्रम में अडानी फाउंडेशन के सामाजिक विकास कार्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए उसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अभिषेक लखटकिया भी उपस्थित रहे।

गहिरमाथा और रुशिकुल्या पर विशेष ध्यान

ओडिशा दुनिया के प्रमुख ओलिव रिडले nesting क्षेत्रों में शामिल है। केंद्रापड़ा जिले का गहिरमाथा और गंजाम जिले का रुशिकुल्या बड़े पैमाने पर कछुओं के सामूहिक प्रजनन और nesting के लिए प्रसिद्ध हैं।

ओलिव रिडले कछुओं को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। अध्ययन के शुरुआती चरण में गहिरमाथा rookery पर व्यापक फील्डवर्क किया गया, जबकि गहिरमाथा और रुशिकुल्या दोनों क्षेत्रों में कछुओं की सैटेलाइट टैगिंग की गई।

नर और मादा कछुओं के आवागमन में अंतर

WII के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर. सुरेश कुमार के अनुसार, ओडिशा में करीब 15 वर्ष बाद ओलिव रिडले कछुओं की सैटेलाइट ट्रैकिंग दोबारा शुरू हुई है। उनके मुताबिक, अध्ययन से कछुओं के आवागमन और उनके आवास के इस्तेमाल को लेकर नई जानकारी सामने आई है, जो वैज्ञानिक आधार पर संरक्षण योजनाएं तैयार करने में मदद कर सकती है।

सैटेलाइट टेलीमेट्री से पता चला कि नर और मादा ओलिव रिडले कछुओं के आवागमन के पैटर्न अलग-अलग हैं। नर कछुओं ने समुद्र की ओर प्रवास पहले शुरू किया, जबकि मादा कछुए अधिक समय तक तट के नजदीकी जलक्षेत्रों में रहीं। अध्ययन में महाद्वीपीय शेल्फ और बंगाल की खाड़ी में संभावित भोजन तलाशने वाले पड़ावों के संकेत भी मिले हैं।

एक मादा कछुए ने 271 दिनों में 6,719 किलोमीटर की दूरी तय की और श्रीलंका के पूर्वी हिस्से के समुद्री क्षेत्र तक पहुंची। वहीं, एक अन्य कछुआ गहिरमाथा से रुशिकुल्या तक करीब 200 किलोमीटर गया और फिर वापस लौटा। इससे ओडिशा के अलग-अलग तटीय क्षेत्रों के बीच ओलिव रिडले कछुओं की आवाजाही का पता चलता है।

2025-26 nesting season में 1,390 कछुए दर्ज

2025-26 के nesting season के दौरान किए गए नाव-आधारित सर्वेक्षण में 1,390 व्यक्तिगत कछुए और 67 mating pairs दर्ज किए गए। अधिकांश कछुओं की मौजूदगी तटरेखा से दो किलोमीटर के भीतर पाई गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कछुओं के आवागमन और उनके आवास के इस्तेमाल के पैटर्न को बेहतर ढंग से समझने के लिए लगातार निगरानी की आवश्यकता है। इससे nesting habitats के दीर्घकालिक संरक्षण की रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।

डॉ. प्रीति अडानी ने संरक्षण प्रयासों को बताया महत्वपूर्ण

अडानी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति जी. अडानी ने कहा कि ओलिव रिडले ओडिशा की प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके संरक्षण के लिए उनके जीवनचक्र तथा समुद्री यात्रा को बेहतर ढंग से समझना जरूरी है।

उन्होंने WII के वैज्ञानिक अध्ययन में सहयोग करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा sustainability और पर्यावरण संरक्षण पर दिया जा रहा ध्यान ऐसे वैज्ञानिक संरक्षण कार्यों के लिए आधार प्रदान करता है।

ओडिशा में करीब एक दशक से काम कर रहा अडानी फाउंडेशन

अडानी फाउंडेशन के अनुसार, वह ओडिशा में करीब एक दशक से विभिन्न सामाजिक विकास कार्यक्रम चला रहा है। इसके कार्यक्रम राज्य के सात जिलों के 283 गांवों तक पहुंचते हैं।

फाउंडेशन के कार्यक्रमों में शिक्षा एवं छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सेवाएं, वेलनेस सेंटर, मोबाइल मेडिकल यूनिट और विशेष स्वास्थ्य शिविर शामिल हैं। इसके अलावा किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए आजीविका कार्यक्रम तथा सड़क, पेयजल, स्वच्छता और ग्रामीण विद्युतीकरण से जुड़ी सामुदायिक बुनियादी सुविधाओं के विकास में भी सहयोग दिया जा रहा है।

ओलिव रिडले पर यह अध्ययन ओडिशा के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीव संरक्षण के लिए वैज्ञानिक जानकारी जुटाने की दिशा में जारी व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

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