नई दिल्ली। मीडिया स्कैन एवं कलाप्रेमी लेखक संघ (कलेस) के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को हरियाणा भवन, कॉपरनिकस मार्ग, नई दिल्ली में सायं 4:30 बजे ‘मेरे पत्रकार, तेरे पत्रकार के बीच लेबलिंग की दीवार’ विषय पर संवाद आयोजित हुआ। इसमें जंतर मंतर प्रोटेस्ट को ग्राउंड जीरो से कवर करने वाले पत्रकारों की चुनौतियों और अनुभवों पर विस्तार से चर्चा हुई।
चर्चा में सामने आया कि ग्राउंड पर काम कर रहे पत्रकारों को बार-बार ‘गोदी मीडिया’ कहकर संबोधित किया गया। प्रेस क्लब में सवाल पूछने से रोका गया, क्योंकि उनके सवाल निर्धारित लाइन के अनुरूप नहीं थे। एक पत्रकार ने कहा कि गोदी मीडिया कहे जाने वाले पत्रकार के पास भी अपनी बात कहने का अधिकार है या नहीं, यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए। दूसरे पक्ष ने बताया कि उन्हें लिंचिंग की स्थिति का सामना करना पड़ा, सरकारी या कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं थी, जबकि सामने पूरी तरह तैयार और वामपंथ और कांग्रेस समर्थित फौज खड़ी थी। जो पत्रकार वहां राष्ट्रीय विचार के साथ खड़े थे, उनके सामने यह भी स्पष्ट नहीं था कि संकट आने पर कोई साथ देगा या नहीं। कांग्रेसी और वामपंथी फौज को हर तरह की सहायता ग्राउंड जीरो पर उपलब्ध थी।
कनाट प्लेस से लेकर जनपथ तक जब एकतरफा ‘गोदी मीडिया’ का नारा चल रहा था, हौसला बढ़ता रहा। लेकिन जब पलटकर ‘पप्पू मीडिया’ कहा गया तो खलबली मच गई। पत्रकारिता का पाठ दुहराने और आपसी भाईचारे की बातें शुरू हो गईं। कनाट प्लेस से रिपोर्टिंग कर रहे दरबारी मीडिया ने व्यक्तिगत प्रयासों से चल रहे दस-पंद्रह यूट्यूबर्स के काम को संगठित गिरोह के रूप में पेश किया, जबकि दरबारी मीडिया के पैसे लेकर रील्स बनाने की बातें सार्वजनिक हो चुकी थीं। केशव ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह पहला प्रोटेस्ट था, जहां पत्रकार ही पत्रकार के पीछे पड़ गया था। प्रोटेस्ट साइट पर पब्लिक से ज्यादा पत्रकार होने के कारण पत्रकार पब्लिक की जगह एक-दूसरे से सवाल पूछ रहे थे।
दरबारी मीडिया बार-बार पीछे से शोर मचाकर ‘गोदी मीडिया, इनसे बात नहीं करना’ कहता रहा। जब सभी पीड़ित पत्रकार मिले और फाइट बैक किया, तो बीबीसी, न्यूज पिंच, वायर और सटायर जैसी वेबसाइटों के साथ जो हुआ, वह इतिहास बन गया। उसके बाद गोदी मीडिया का शोर कुछ कम हुआ और ‘रहम, रहम’ की आवाज सुनाई देने लगी। ढाई घंटे का यह संवाद ग्राउंड की वास्तविक जानकारी से भरा रहा। पत्रकारों ने बताया कि वे हर तरह की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं, लेकिन कानूनी दांव-पेंच में फंसने पर गहरा अकेलापन महसूस होता है। दूसरे राज्य में एफआईआर होने पर विचार के लिए लड़ रहा पत्रकार अकेला पड़ जाता है। सुझाव आए कि यदि ये चर्चाएं समाधानपरक हों तो सफलता मानी जाएगी, अन्यथा यह चाय-बिस्कुट पर खत्म होने वाला आयोजन भर रह जाएगा। मीडिया स्कैन का मानना है कि बातचीत जारी रहनी चाहिए। बीमारी सही डायग्नोस हो जाए तो सामाधान आसान होगा।
पैम्फलेट से भाग्यश्री, जो जेन जी हैं, ने कहा कि वे पहली बार किसी प्रोटेस्ट को कवर करने गई थीं। प्रेस क्लब में आशुतोष रांका से सवाल पूछने पर उन्हें गोदी मीडिया कहकर चुप कराने की कोशिश हुई। भाग्यश्री ने कहा कि सवाल उनका था, जवाब क्यों नहीं दिया गया। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ आईसा या प्रेस क्लब ऑफ कांग्रेस नहीं है। यदि परिसर में पत्रकारों के अधिकार सुरक्षित नहीं हैं और ‘अपने-गैर अपने’ की समझ से संचालन हो रहा है, तो दरवाजे पर लिख देना चाहिए कि यह कांग्रेस प्रेस क्लब है और भाजपा-आरएसएस विचारधारा वाले पत्रकार प्रवेश न करें।
इस चर्चा को समृद्ध करने में खबर इंडिया के सुशील चौधरी, खबर पंच से रोहित अत्री, ग्लोबल भारत टीवी से अभिषेक शांडिल्य, पालिटिकल अड्डा से चन्द्रकेश, आॅप इंडिया से चंदन कुमार और केशव मालन, पैम्फलेट से रानू और भाग्यश्री के साथ अनुपम प्रसून, नीतीश ठाकुर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा, आउटलुक से अकांक्षा पारे काशिव, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर पवन विजय, क्रांतिकारी लेखक जलज अनुपम, पालिसी संवाद के संपादक गौरव कुमार मिश्र, भारतीय धरोहर के संपादक बृजेश कुमार, छात्र शक्ति के संपादक अजीत सिंह, वरिष्ठ लेखक केशव पटेल, जय प्रकाश (लखनऊ), सुभाष चन्द्र और दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (DJJS) आचार्य विशालानंद के सान्निध्य में संपन्न हुआ। आदित्य भारद्वाज और अक्षय शर्मा ने योजना से लेकर क्रियान्वयन तक मजबूत स्तंभ की तरह आयोजन को संभाला।
कलाप्रेमी लेखक संघ (कलेस) के इस आयोजन को मीडिया स्कैन, दिल्ली, योगदान सेवा ट्रस्ट नोएडा (उप्र), ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन, जयपुर और उदगम ट्रस्ट अहमदाबाद का सहयोग मिला।
पुनश्च : जंतर मंतर प्रोटेस्ट पर बोलने वालों की आवाज दबनी नहीं चाहिए। बोलने की आजादी सिर्फ पप्पू मीडिया या दरबारी मीडिया के हिस्से की नहीं है। यह आजादी भारत के संविधान ने हर नागरिक को दी है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की भूमिका तटस्थ संस्था की होनी चाहिए थी। इस पूरे प्रकरण में उसने अपनी भूमिका को संदिग्ध बनाया है।

