New Delhi : दिल्ली-एनसीआर में परिवहन व्यवस्था को आधुनिक, तेज और सुविधाजनक बनाने की दिशा में प्रस्तावित दिल्ली-पानीपत-करनाल नमो भारत (आरआरटीएस) कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण परियोजना है। इसके निर्माण से दिल्ली, हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों के बीच आवागमन को नई गति मिलने की उम्मीद है। लेकिन किसी भी बड़े परिवहन कॉरिडोर का निर्माण केवल ट्रैक बिछाने और स्टेशन बनाने तक सीमित नहीं होता। इसके लिए बिजली, पानी, संचार और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े नेटवर्क का सुरक्षित एवं व्यवस्थित प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए टाटा पावर-डीडीएल और नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनसीआरटीसी) ने प्रस्तावित कॉरिडोर पर बिजली संबंधी सुविधाओं को स्थानांतरित करने में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह पहल बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्टों में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की अहमियत को रेखांकित करती है।
136.3 किलोमीटर का कॉरिडोर, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मिलेगी मजबूती
प्रस्तावित दिल्ली-पानीपत-करनाल नमो भारत कॉरिडोर की लंबाई लगभग 136.3 किलोमीटर बताई गई है। इसमें कुल 21 स्टेशन प्रस्तावित हैं, जिनमें छह दिल्ली और 15 हरियाणा में होंगे। परियोजना में लगभग 124.82 किलोमीटर एलिवेटेड और 11.48 किलोमीटर भूमिगत ट्रैक शामिल हैं।
उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार, नमो भारत ट्रेन की अधिकतम डिजाइन गति 180 किलोमीटर प्रति घंटा और औसत परिचालन गति लगभग 160 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। ट्रेनों की आवृत्ति पांच से दस मिनट के बीच रखने की योजना बताई गई है। कॉरिडोर के चालू होने पर यात्रियों को तेज और सुविधाजनक क्षेत्रीय परिवहन का विकल्प मिल सकता है। इससे सड़क यातायात पर दबाव कम करने और प्रमुख शहरी केंद्रों के बीच संपर्क बेहतर बनाने में भी मदद मिलने की संभावना है।
हालांकि, इन लाभों को वास्तविकता में बदलने के लिए निर्माण कार्य का समयबद्ध पूरा होना और सभी संबंधित विभागों के बीच प्रभावी तालमेल आवश्यक होगा।
बिजली नेटवर्क का सुरक्षित स्थानांतरण बड़ी चुनौती
इस कॉरिडोर के निर्माण क्षेत्र में विभिन्न क्षमता वाली बिजली लाइनों और उपकरणों का नेटवर्क मौजूद है। इनमें 765 केवी, 400 केवी, 132 केवी और 66 केवी की 38 अति उच्च वोल्टेज (ईएचवी) ट्रांसमिशन लाइनें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 33 केवी, 11 केवी और 415 वोल्ट की लाइनें तथा ट्रांसफॉर्मर जैसे अन्य विद्युत उपकरण भी मौजूद हैं।
इन बिजली सुविधाओं का प्रबंधन बीएसईएस, टाटा पावर-डीडीएल, उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (यूएचबीवीएनएल), हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम (एचवीपीएनएल), पावर ग्रिड, भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) और जेकेटीपीएल सहित विभिन्न एजेंसियां करती हैं। निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित स्थानों पर मौजूद विद्युत नेटवर्क को जरूरत के अनुसार स्थानांतरित या पुनर्स्थापित करना होगा।
यह काम तकनीकी दृष्टि से संवेदनशील है। बिजली लाइनों को स्थानांतरित करते समय सुरक्षा मानकों, आवश्यक अनुमतियों और विद्युत आपूर्ति की निरंतरता का ध्यान रखना जरूरी है। किसी भी स्तर पर तालमेल की कमी निर्माण में देरी के साथ-साथ बिजली आपूर्ति पर भी असर डाल सकती है।
एमओयू से एजेंसियों के बीच समन्वय को मिलेगा आधार
समझौते के प्रावधानों के अनुसार, टाटा पावर-डीडीएल ईएचवी, एचटी और एलटी विद्युत नेटवर्कों के स्थानांतरण या पुनर्स्थापन से जुड़ी आवश्यक निगरानी और अनुमोदन संबंधी प्रक्रिया में सहयोग करेगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कॉरिडोर का निर्माण निर्धारित सुरक्षा और वैधानिक मानकों के अनुरूप आगे बढ़ सके तथा बिजली वितरण व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे।
इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना की निगरानी भारत सरकार के पीएमजी पोर्टल के माध्यम से की जा रही है। ऐसे में विभिन्न विभागों और उपयोगिता सेवाओं से जुड़ी एजेंसियों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारियां तय करना परियोजना के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
एमओयू पर टाटा पावर-डीडीएल की ओर से चीफ—कस्टमर एक्सपीरियंस, कमर्शियल एंड कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस किरण गुप्ता तथा एनसीआरटीसी की ओर से कंपनी सचिव विजय कुमार ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर दोनों संगठनों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
विकास के साथ विश्वसनीय बिजली आपूर्ति भी जरूरी
टाटा पावर-डीडीएल की किरण गुप्ता ने कहा कि एनसीआरटीसी का कॉरिडोर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को नया आयाम देने और आर्थिक विकास को गति प्रदान करने वाली बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजना है। उन्होंने कहा कि नेटवर्क को समयबद्ध और कुशल तरीके से स्थानांतरित करने के माध्यम से कंपनी परियोजना के निर्माण में सहयोग करेगी, जबकि उपभोक्ताओं को भरोसेमंद बिजली आपूर्ति जारी रखने पर भी ध्यान दिया जाएगा।
उनके अनुसार, यह प्रयास राष्ट्र निर्माण और भविष्य की पीढ़ियों के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचा विकसित करने की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।
कंपनी के अनुमान के मुताबिक, विद्युत सुविधाओं को स्थानांतरित करने का काम शुरू होने के बाद इसे पूरा करने में लगभग एक वर्ष लग सकता है। इस अवधि में कार्य की गति के साथ सुरक्षा और बिजली आपूर्ति की निरंतरता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
आधुनिक शहरों के लिए साझा योजना और जवाबदेही आवश्यक
दिल्ली-एनसीआर जैसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र में परिवहन और ऊर्जा संबंधी बुनियादी ढांचे को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। मेट्रो, आरआरटीएस, सड़क और अन्य सार्वजनिक परिवहन परियोजनाओं की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि निर्माण एजेंसियां मौजूदा बिजली तथा दूसरी उपयोगिता सेवाओं के साथ कितना बेहतर समन्वय स्थापित करती हैं।
टाटा पावर-डीडीएल और एनसीआरटीसी के बीच हुआ यह समझौता इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। अब इसकी वास्तविक सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि बिजली नेटवर्क का स्थानांतरण कितनी सुरक्षित, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरा होता है। यदि एजेंसियों के बीच प्रभावी संवाद, स्पष्ट जवाबदेही और तकनीकी मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाता है, तो इससे न केवल नमो भारत कॉरिडोर के निर्माण को मदद मिलेगी, बल्कि क्षेत्र की मौजूदा बिजली व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने में भी योगदान मिल सकता है।
आधुनिक परिवहन का उद्देश्य केवल दूरी घटाना नहीं, बल्कि नागरिकों के समय, संसाधनों और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना भी है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए तेज रफ्तार रेल के साथ मजबूत बिजली नेटवर्क और जिम्मेदार संस्थागत समन्वय भी उतने ही आवश्यक हैं।

