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मिथिला को समग्रता में समझने का बेहतरीन अवसर था मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल

मधुबनी (बिहार)। तीन दिनों में हजारों लोगों ने जिस प्रकार से मिथिला की ऐतिहासिकता, पौराणिकता, ज्ञान परंपरा से साक्षात्कार किया, वह अप्रतिम रहा। मिथिला की उर्वर भूमि पर ऐतिहासिक राजनगर प्रांगण में लोगों ने अपने अतीत को समझा। सेंटर फॉर स्टडीज ऑफ ट्रेडिशन एंड सिस्टम्स (सीएसटीएस) ने मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन किया। इस आयोजन में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, साहित्य अकादमी, गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति नई दिल्ली, विश्वेश्वर सिंह जनता महाविद्यालय, मधुबनी और सीमा सशस्त्र बल की 18वीं वाहिनी ने सीएसटीएस को सहयोग किया।

19 दिसंबर, 2018 को मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल का दीप प्रज्वलित कर मधुबनी पेंटिंग की हस्ताक्षर बौआ देवी, जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक, एसएसबी कमांडेंट अजय कुमार, राजनगर कालेज के प्राचार्य हीरानन्द आचार्य, साहित्यकार श्री भीमनाथ झा , भाषा विज्ञानी श्री रामवतार यादव , पुरातत्ववेत्ता श्री फनिकान्त मिश्र ने औपचारिक उदघाटन किया। कार्यक्रम के पहले दिन कवि गोष्ठी, तंत्र विद्या, शक्ति, रसनचौकी सहित ध्रूप गायन की प्रस्तुति की गई। मधुबनी पेंटिंग्स के स्टॉल के साथ साथ पुस्तकों की भी स्टाल लगाई गई जिसमें पाग, दोपट्टा, फूड, किताबें और भी कई तरह को स्टॉल में सजाया गया था। जिलाधिकारी के साथ साथ सभी अतिथियों में सभी स्टॉल का बारीकी से निरीक्षण किया। कार्यक्रम के दौरान पुस्तक “अहिबात“ का विमोचन भी हुआ।

आगत अतिथियों और सहभागियों को आयोजक की ओर से जूट का एक थैला, कप, मोमेंटों और खादी का एक गमछा दिया गया। असल में, मिथिला की मार्टी महात्मा गांधी से काफी प्रभावित रही। यहां की महिलाएं आज भी घरों में चरखा चलाती हैं। सूत कातती हैं। जनउ बताती हैं। सीकी का कारोबार करती हैं। लघु और कुटीर उद्योग को बढावा देने के लिए खादी के गमछा को दिया गया,ताकि मिथिला ही नहीं देश-विदेश में जो भी इसे लेकर जाएं वो गांधी दर्शन और गांधी की सोच को महसूस करें।

लिटरेचर फेस्टिवल में मिथिला संस्कृति एक बार फिर जीवंत हो उठी। इस मौके पर देश-विदेश और नेपाल के कई मैथिली साहित्यकार विद्वानों ने भाग लिया। दूर-दूर से विद्वान आए। यहां कई प्रकार की प्रदर्शनी लगाई गई। असल में, राजनगर सिर्फ राजा का प्रसाद नहीं है. यह धरोहर है सभयता और संस्कृति का। यह लिटरेचर फेस्टिवल बहुभाषिक समुदाय की अपने धरोहर को समेटने के लिए सम्रद्धि साहित्य कला के उल्लास का एक उत्सव रहा। इस उत्सव का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को उसके समृद्ध, संस्कृति से परिचय और विस्थापन को रोकना है। इस फेस्टिवल में हस्तकला, मिथिला चित्रकला, गोदना, तंत्र, भोजन विन्यास, मैथिली रंगमंच, धुपद संगीत घराना आदि विषयों पर पैनल डिस्कशन, वार्ता एवं प्रशिक्षण शिविर का आयोजन हुआ।

आखिर यह आयोजन क्यों ? सीएसटीएस की डॉ. सविता झा खान ने कहा कि हमारी कोशिश मिथिला की पंरपरा, संस्कृति, साहित्य आदि को एक मंच पर लाने की है। इसी कोशिश के तहत बीते साल हमने देश की राजधानी दिल्ली में ‘मैथिली मचान’ के जरिये विश्व पुस्तक मेला में किया था। इस बार मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल में मिथिला को समग्रता में लोगों के सामने लाने की कोशिश है। इसमें कई भारत के साथ ही नेपाल के कई विद्वतजनों ने सहयोग दिया है। हम और आयोजन से जुड़े सभी लोग उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं। इस आयोजन में स्थानीय जिला प्रशासन ने भी मदद की है। डॉ. खान ने बताया कि तमाम सत्र में जिन-जिन विद्वानों को आमंत्रित किया गया है, वे मिथिला की माटी से हैं। इतने विद्वानों का एक साथ एक स्थान पर जुटान ही मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल की महत्ता और व्यापकता को बताता है।

कई सत्र में वक्ताओं ने कहा कि जब हम कोसलपुरी अयोध्या का नाम लेते हैं, उस समय विदेह-पुरी मिथिला का भी स्मरण हो आता है। ये दोनों ही धार्मिक पुरियाँ हर काल में हमारे लिए प्रेरणा एवं संबल का स्रोत रही हैं। यह वर्तमान में उत्तरी बिहार और नेपाल की तराई का इलाक़ा है जिसे मिथिला या मिथिलांचल के नाम से जाना जाता था। मिथिला की लोकश्रुति कई सदियों से चली आ रही है जो अपनी बौद्धिक परंपरा के लिये भारत और भारत के बाहर जाना जाता रहा है। इस इलाके की प्रमुख भाषा मैथिली है। धार्मिक ग्रंथों में सबसे पहले इसका उल्लेख रामायण में मिलता है। बिहार-नेपाल सीमा पर विदेह (तिरहुत) का प्रदेश जो कोसी और गंडकी नदियों के बीच में स्थित है। इस प्रदेश की प्राचीन राजधानी जनकपुर में थी। मिथिला का उल्लेख महाभारत, रामायण, पुराण तथा जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों में हुआ है। मिथिला के प्रसंग में इस तरह की और भी मधुर घटनाओं की स्मृतियाँ हमारे प्राचीन साहित्य के पन्नों में सुरक्षित हैं। वहाँ के नागरिक कला और संस्कृति के प्रेमी थे। महिलाएँ बहुमूल्य आभूषण तथा सुगन्धित द्रवों को व्यवहार में लाती थीं। नगर के भीतर ऊँची अट्टालिकाएँ, रम्य चत्वर, मनोरम वाटिकाएँ एवं उद्यान मौजूद थे। मिथिला नाम कैसे पड़ा, इस संबन्ध में पुराणों में एक भारतीय परम्परा उल्लिखित मिलती है। इसके अनुसार इस नगर को मिथि नामक राजा ने बसाया। वे इस पुरी को जन्म देने में समर्थ सिद्ध हुए, अतएव वे जनक नाम से प्रसिद्ध हो गए। वायु पुराण और विष्णु पुराण में निमि को विदेह का राजा कहा है तथा उसे इक्ष्वाकु वंशी माना है। मिथिला राजा मिथि के नाम पर प्रसिद्ध हुए। विष्णु पुराण में मिथिलावन का उल्लेख है। विष्णु पुराण में मिथिला को विदेह नगरी कहा गया है। मज्झिमनिकाय और निमिजातक में मिथिला का सर्वप्रथम राजा मखादेव बताया गया है। जातक में मिथिला के महाजनक नामक राजा का उल्लेख है। साथ ही वक्ताओं ने मिथिला के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी बात की।

पुरातत्वविद फणीकांत मिश्र ने कहा कि राजनगर का राजपरिसर इटालियन सभ्यता का उत्कृष्ट नमूना है। काली मंदिर के निर्माण में की गई नक्काशी काबिल-ए-तारीफ है। यह स्थल तंत्र साधना का विशिष्ट केंद्र रहा है। यहां की मिट्टी में ऐसी कौन सी खासियत है कि दरभंगा नरेश रमेश्वर ोसह ने राजपरिसर निर्माण के वास्ते राजनगर का ही चयन किया। इस विषय पर शोध होना चाहिए। उन्होनें डीएम से मधुबनी को मंदिरों का शहर घोषित किये जाने की मांग की। उन्होंने आम जन से राजपरिसर का संरक्षण नहीं तो वोट नहीं का मुद्दा उठाने तथा इस सवाल पर सांसद व विधायक को घेरने की अपील की। ध्रुपद गायन की प्रस्तुति दरभंगा घराने के सुमित और कौशिक जी ने किया और इनके गायन सुनकर दर्शक मंत्रमुग्ध रहे.

 

कवियों के कवी संगोष्ठी में ने बेहतरीन प्रस्तुति दी. वहीँ मिथिला का पारंपरिक रसनचौकी के कलाकारों ने अपने वाद्ययंत्रों से सभी दर्शकों का मन मोह लिया. समारोह में डिप्टी कमान्डेंट जीतेंद्र जोशी, प्रो. उदयचन्द्र झा विनोद, डॉ. लक्ष्मीनाथ झा, डॉ. भवनाथ झा, डॉ. मित्रनाथ झा, डॉ. सदानंद झा, डॉ. विनयानंद झा, प्रो. श्रीश चौधरी, प्रो एमजे वारसी, डॉ. मिथिलेश कुमार झा, अमित आनंद, आनंद मोहन झा, संजीव झा, वीणा झा, घोघर राम, इंदु झा, उद्दमला देवी, दुलारी देवी,ललिता देवी, अरहुलिया देवी समेत दर्जनों प्रबुद्ध शामिल हुए।

तीन दिवसीय आयोजन में मैथिली भाषाई परिदृष्य, मैथिली प्रकाशन आ पुस्तकीय संस्कृति, मिथिला में शक्ति की अवधारणा, मैथिली साहित्य आ समकालीन चुनौती, मैथिली प्रकाशन आ पुस्तकीय संस्कृति, क्षेत्रीय विकास में मीडिया की भूमिका पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। हाट बाजार : मिथिला के स्थानीय उद्योग, मिथिला मे जल संसाधन (समाजशास्त्री प्रो. हेतुकर झा को समर्पित सत्र), मिथिला मे पुरातात्विक संरक्षण आ समस्या, मिथिला मे पुरातात्विक संरक्षण आ समस्या (पुरातत्वविद् डॉ विजयकांत मिश्र समर्पित सत्र), ग्राम गाथा, मिथिलाक दर्शन आ ज्ञान परंपरा (सर्वतंत्रस्वतंत्र पं. बच्चा झाक 100वीं पुण्यतिथि वर्ष पर समर्पित सत्र), भारत-नेपाल संबंध आ संस्कृति (सिनेहबंध), मिथिला में तंत्र परंपरा : उद्भव व विकास, तंत्र उपासना का लौकिक पक्ष जैसे सत्र में विद्वानों ने अपना मंतव्य प्रकट किया। वक्ताओं ने कहा कि मिथिलांचल आदिकाल से तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां राजघराने से लेकर सामान्य परिवारों में भी बड़े-बड़े तंत्र साधक होते रहे हैं। मिथिला को प्राचीनकाल से ही तंत्र भूमि के नाम से जाना जाता था। कालांतर में तंत्र साधना का यह केंद्र कम होता गया। तांत्रिक दरभंगा के बजाय पश्चिम बंगाल के तारापीठ एवं असम के कामाख्या मंदिर का रूख करने लगे। हालांकि अभी भी मिथिलांचल के कुछ हिस्सों में तांत्रिक सिद्धि करते नजर आते हैं। पश्चिम बंगाल, ओडिशा एवं असम के तंत्र विद्या के केंद्र के रूप में दरभंगा रहा है। यहां एक से बढ़कर एक तांत्रिक साधना के लिए जुटते थे। मिथिलांचल के कई गांव तंत्र साधना के रूप में जाने जाते रहे हैं। इनमें मधुबनी जिले के पंडौल प्रखंड अंतर्गत सरिसहपाही व लखनौर आदि प्रसिद्ध रहे हैं। यहां आज भी लोग तंत्र साधना करते हैं।

मिथिला के प्रसंग में इस तरह की और भी मधुर घटनाओं की स्मृतियाँ हमारे प्राचीन साहित्य के पन्नों में सुरक्षित हैं। वहाँ के नागरिक कला और संस्कृति के प्रेमी थे। महिलाएँ बहुमूल्य आभूषण तथा सुगन्धित द्रवों को व्यवहार में लाती थीं। नगर के भीतर ऊँची अट्टालिकाएँ, रम्य चत्वर, मनोरम वाटिकाएँ एवं उद्यान मौजूद थे। विश्व को आज जो भी मानव मूल्य मिले हैं वह मिथिला की धरती की देन है, जिसमें बौद्धिक उर्वरता व सृजन की अद्भुत क्षमता है। इस धरती ने हजारों सालों के इतिहास में न जाने कितने महान विभूतियों को जन्म दिया है। आज दुनिया को रास्ता दिखाने के लिए मिथिला की सभ्यता-संस्कृति को आगे ले जाने की आवश्यकता है।

इसी दिन शाम में भानु कला केंद्र, नेपाल के कलाकारों ने उपस्थित हजारों लोगों का मन मोह लिया। तीसरे दिन 21 दिसंबर, 2018 को मैथिली नाटकक वर्तमान परिदृश्य, बाल साहित्य आ बाल रंगमंच में प्रो दमन कुमार झा, नाट्यकर्मी ऋषि आचार्य और संयुक्त अरब अमीरात से आए डॉ कुमार पद्मनाभ ने बाल मनोविज्ञान, मिथिला के परिवेश पर बड़े फलक में बात की। इसके साथ ही मैथिली आलोचना : वर्तमान परिदृश्य, आधुनिक युग में तंत्र की प्रासंगिकता पर सत्र का आयोजन किया गया। ये तमाम सत्र मुख्य परिसर और दो सभागार में आयोजित किए गए। साथ ही कवि गोष्ठी का आयोजन मुख्य परिसर सहित दुर्गा मंदिर प्रांगण में किया गया।

राजनगर स्थित राजपरिसर में चल रहे मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम सत्र में इप्टा के तत्वावधान में वागीश कुमार झा लिखित ोहदी नाटक महाभारत की एक सांझ का सफल मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से राजनीति व राजसत्ता की दुरभिसंधियों पर तीखा व्यंग्य किया गया। राजनेता कैसे सामाजिक मुद्दों को खड़ा करते हैं तथा फिर उन मुद्दों के आधार पर किस तरह राजनीतिक रोटी सेंकने का काम करते हैं। इसका खूबसूरती से चित्रण किया गया। नाटक में भ्रष्टाचार तथा नारी सशक्तीकरण पर भी फोकस किया गया है। युधिष्ठिर के रोल में श्रीप्रसाद दास, दुर्योधन की भूमिका में अर्जुन राय, शकुनी की भूमिका में रमेश कुमार व भीष्म के रोल में रंजीत राय ने अमिट छाप छोड़ी। धृतराष्ट्र के रोल में प्रभात रंजन, विदुर की भूमिका में रोशन कुमार दास, द्रोपदी व द्रोपदी पार्ट टू के रूप में क्रमशः मिन्नी झा व अंशु कुमारी तथा पत्रकार की भूमिका में पंचम प्रकाश ने प्रभावकारी अभिनय कर दर्शकों को प्रभावित किया। अभिषेक आकाश व राहुल कुमार का निर्देशन प्रभावकारी था।

अंतिम दिन समापन सत्र जिसे उद्यापन का नाम दिया गया, उससे पहले सांस्कृतिक-सह-विविध कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें मिथिरंग तरंग (अच्छिनजल) की प्रस्तुति हुई। इसके साथ ही प्रतिदिन कार्यशाला- मिथिला पेंटिंग, प्रदर्शनी- हस्तकरघा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मैथिली साहित्य संस्थान पुस्तक मेला- राष्ट्रीय, मैथिली अकादमी, साहित्यिकी, जानकी पुस्तक केंद्र, पुस्तक विमोचन, गांधी कवि गोष्ठी, नुक्कड़ नाटक, प्रतियोगिता- मैथिली गीतनाद, अरिपन आदि का आयोजन किया गया। तमाम सत्र में संबंधित क्षेत्र के निष्णात विद्वानों ने अपनी बातें रखीं।

 

सुभाष चन्द्र

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