दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव का मुद्दा उठाती है पुष्पेंद्र आल्बे की फिल्म ‘जूठन’

 

नई दिल्ली। अंग्रेजी फिल्म वारा और ढेरों अवार्ड जीतने वाली भोर में अपने अभिनय का जलवा बिखेरने वाले अभिनेता देवेश रंजन और सेक्टर बालाकोट जैसी फिल्म लिखने वाले प्रयोगधर्मी लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे की आगामी बॉलीवुड फिल्म जूठन दलित समाज के बच्चों के साथ शिक्षा में होने वाले जातिगत भेदभाव पर कडा प्रहार करती है. फिल्म 29 दिन की शूटिंग अगस्त महीने में मध्यप्रदेश की वास्तविक लोकेशन पर की गई और फिलहाल पोस्ट-प्रोडक्शन स्टेज में है.

संजीदा अभिनय के लिए विख्यात देवेश रंजन की मुख्य भूमिका वाली जूठन का निर्माण पुष्पेंद्र आल्बे और निकिल प्रणव आर की कंपनी एडाप्ट ए स्कूल फिल्म्स ने किया है. फिल्म के क्रिएटिव प्रोड्यूसर मिलन गुप्ता हैं, वहीं पब्लिशिटी डिजाइन रोहित पंवार ने की है. फिल्म में नरेश कुमार (बाहुबली फ्रेंचाइजी फेम), विक्रम सिंह (भाग मिल्खा भाग, मिर्जियाॅ फेम), कुलदीप कुमार, संदीप गुप्ता, रिमझिम राजपूत और दिनेश शर्मा (इश्कियां, तनु वेड्स मनु और कागज फेम) भी अहम् भूमिकाओं में नजर आएंगे.

“हम भले ही सबके लिए समान शिक्षा के दावे करते हों, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि जातिगत भेदभाव अभी भी समाज को खोखला कर रहा है, खासकर ग्रामीण भारत में. इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि दलित समाज के बच्चों की शिक्षा इस जातिगत भेदभाव की वजह से हाशिए पर है” पुष्पेंद्र आल्बे बताते हैं.

आॅक्सफाम की रिपोर्ट के मुताबिक देश में स्कूल छोड़ने वाले एससी-एसटी और ओबीसी तबके के बच्चों की संख्या अन्य तबकों से कहीं ज्यादा है. स्कूल बीच में ही छोड़ देने वाले 60 लाख बच्चों में से 75 फीसदी बच्चे दलित या आदिवासी हैं.

“जूठन इसी मुद्दे पर बात करती है कि शिक्षा पर सबका बराबर अधिकार है. दलित समाज के बच्चों को सिर्फ इसलिये शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे निचले तबके के हैं. दलित और निचले तबके को भी दुर्भावनामुक्त समान शिक्षा मुहैया सुनिश्चित करके ही उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है. इसके लिए छुआछूत को जड से खत्म करना होगा. शिक्षा में ये छूआछूत हमारे देश के एक वैश्विक महाशक्ति बनने में सबसे बडी रूकावट है” पुष्पेंद्र आल्बे अपनी बात रखते हुए कहते हैं.

एक हैरान करने वाला तथ्य यह भी है कि देश की प्राथमिक स्कूलों में पांच में से चार महिला शिक्षक ऊपरी तबके के हैं. इसी तरह हर पांच में से एक पुरूष शिक्षक भी ऊपरी तबके से है. इसके चलते अगर दलित समाज के बच्चें पढने का जज्बा भी दिखाते हैं, तो भी उनके अरमानों और हौसलों को कुचल दिया जाता है!

“जातिगत भेदभाव की शुरुआत यहीं से होती है. इंटरनेट पर सर्च करें तो पता चलता है कि दलित बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव में सबसे बडी भूमिका शिक्षक ही निभाते हैं, जो अधिकतर मौकों पर ऊपरी तबके से संबंध रखते हैं” पुष्पेंद्र आल्बे आगे बताते हैं.

इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसे मामलों को अक्सर दबा दिया जाता हैं, क्योंकि बडे पदों पर बैठे हुए अधिकारी भी ऊपरी तबके से ही ताल्लुक रखते हैं.

“देश के हर कोने में अक्सर ऐसी खबरें हेडलाइन्स बनती है कि दलित बच्चों को कक्षा में अलग बै
बिठाया गया, मिड डे मिल में उनके साथ भेदभाव किया गया, उनके बर्तनों को स्कूल के कर्मचारियों द्वारा साफ करने से इंकार कर दिया. जब तक दलित समाज के खिलाफ इस तरह की मानसिकता को खत्म नहीं किया जाता, सबके लिए समान शिक्षा एक मुहावरे से ज्यादा कुछ नहीं है” पुष्पेंद्र आल्बे अपनी बात खत्म करते हुए कहते हैं.

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